पर्दे में रहने दो ,पर्दा ना उठाओ ,पर्दा जो उठ गया तों भेद खुल जाएगा ,जी हाँ यह यातायात पुलिस हें ,कुछ भी कर सकती हें।24घंटे थाना पर बिठाकर स्टेशन डायरी में भी जिक्र भी नहीं करती , न्यायालय को भी गुमराह कर देती हें , और कहती हें “यातायात पुलिस आपके सेवा में तत्पर “
पर्दे में रहने दो ,पर्दा ना उठाओ ,पर्दा जो उठ गया तों भेद खुल जाएगा ,जी हाँ यह यातायात पुलिस हें ,कुछ भी कर सकती हें।24घंटे थाना पर बिठाकर स्टेशन डायरी में भी जिक्र भी नहीं करती , न्यायालय को भी गुमराह कर देती हें , और कहती हें “यातायात पुलिस आपके सेवा में तत्पर “
पर्दे में रहने दो ,पर्दा ना उठाओ ,पर्दा जो उठ गया तों भेद खुल जाएगा ,जी हाँ यह यातायात पुलिस हें ,कुछ भी कर सकती हें।24घंटे थाना पर बिठाकर स्टेशन डायरी में भी जिक्र भी नहीं करती , न्यायालय को भी गुमराह कर देती हें , और कहती हें “यातायात पुलिस आपके सेवा में तत्पर “
दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय
पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ ,पर्दा जो उठ गया तों भेद खुल जाएगा ,यह गाना चर्चित हें और यातायात पुलिस पर सटीक बैठती हें लेकिन पर्दा उठाने की जिम्मेदारी लेगा कौन ?
यातायात पुलिस के इतनी गलतियों के बाद भी कारवाई की दिशा में वरीय पुलिस पदाधिकारियों का स्थिर हो जाना जिले में चर्चा का विषय बन गया हें।स्थानीय लोग जिला के वरीय पुलिस पदाधिकारियों पर सवाल उठाना शरू कर दिये हें कि बरामद चालक के मामले में ना कोई स्टेशन डायरी ना कोई कारवाई।
जी हाँ ,हम बात कर रहें हें यातायात थाना के थानाध्यक्ष और अनुसंधानकर्ता के बारे में ,जिन्होंने न्यायालय को गुमराह किया और जिला के वरीय पदाधिकारियों को भी अनदेखा किया लेकिन अभी तक ना ही कोई जांच हुई ,और ना कोई कारवाई।यातायात थाने की पुलिस ने दुर्घटना के एक मामले को ऐसे रफा दफा कर दिया जैसे कोई मामला ही नहीं हुआ हो , कैसे शातिर दिमाग का इस्तेमाल कर एक चालक को खलासी बना दिया और किसी अन्य लाईसेंसी चालक को खड़ा कर उसे न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया ,यह चौंकाने वाला वाकिया तों जरूर हें।
यातायात थाना में दर्ज (32/25) के मामले में ऐसे कई सबूत हें ,जो पुलिस के गलत कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता हें ,सवाल यही कि क्या इस मामले की जानकारी यातायात डीएसपी को नहीं हें ,या फिर वरीय पुलिस अधिकारी सरकारी जाति से खौफ खा रहें हें ,अगर नहीं तों इस मामले की जांच अब तक क्यूँ नहीं हुई ,अगर जांच हुई तों कारवाई क्या हुई।
घटना 28फरवरी की रात की हें।जब दुर्घटना में एक राहगीर की मौत हो जाती हें।बहेड़ी थानाध्यक्ष ट्रक (BRO6GC-9992)के साथ ट्रक चला रहा चालक को गिरफ्तार कर यातायात थाने के पुलिस के हवाले करता हें।उक्त चालक को 24 घंटा से ऊपर थाने में बिठाकर छोड़ दिया जाता हें ,इसके दो दिन बाद 2मार्च 25को वादी के आवेदन पर पुलिस प्राथमिकी 32/25दर्ज करती हें जिसमें चालक का नाम लालबाबू यादव हें।
अब यहां एक प्रश्न यातायात पुलिस पर सटीक बैठती हें कि अगर बहेड़ी थाना पुलिस ने ट्रक समेत चालक को यातायात पुलिस को सौंपा और यातायात पुलिस ने करीब 24घंटे या उससे अधिक समय तक चालक लालबाबू को थाने पर बिठाकर रखा, तों कैसे रखा और क्यूँ छोड़ दिया ऐसे में सवाल बनता हें कि यातायात थानाध्यक्ष द्वारा थाने के स्टेशन डायरी में इस बात का जिक्र किया हें अथवा नहीं ,अगर स्टेशन डायरी में इस बात का जिक्र नहीं किया गया तों मतलब साफ हें कि भारी भरकम रुपये में यातायात पुलिस मैनेज हुई फिर बाद में प्राथमिकी दर्ज हुई।
अब दूसरी पहलुओं पर बात करूं तों बहेड़ी थानाध्यक्ष स्पष्ट शब्दों में कह रहें हें कि ट्रक के साथ पकड़ाया चालक ही गाड़ी चला रहा था और वहीं असली चालक हें और उसे ही यातायात पुलिस के सुपुर्द किया गया।यहां एक सवाल खड़ा होता हें कि बहेड़ी थानाध्यक्ष को इस मामले में झूठ बोलने से क्या फायदा ,यातायात पुलिस से उनकी कोई दुश्मनी तों नहीं हें ,वे ईमानदारी से कर्तव्य का पालन कर रहें हें।फिर चालक को कैसे यातायात पुलिस ने छोड़ दिया,उसे न्यायिक हिरासत में क्यूँ नहीं भेजा।
अब न्यायालय ने जब यातायात पुलिस से गाड़ी से संबंधित प्रतिवेदन मांगा तों गाड़ी से संबंधित कागजात न्यायालय में पेश किया जो बिल्कुल सही हें लेकिन यातायात पुलिस ने चालक को चालक नहीं बताकर यू पी के बिलासपुर के एक चालक का नाम प्रस्तुत किया और उसे जमानत दिला दिया।मतलब न्यायालय के साथ भी यातायात पुलिस ने धोखा किया।
दरअसल चालक लालबाबू यादव के पास ड्राईविंग लाईसेंस नहीं था जिसके कारण इतनी कहानियां रची गई।
न्यायालय में सौंपे प्रतिवेदन में कहा गया हें कि उक्त ट्रक को ग्रामीणों के सहयोग से पकड़ा गया ,उक्त प्रतिवेदन यह जिक्र हें कि चालक लालबाबू ने कहा कि उत्तर प्रदेश राज्य का चालक तजबुद्दिन ट्रक छोड़कर भाग गया और वह उप चालक के रूप में काम करता हें ।यहां बता देना चाहते हें कि उतरप्रदेश बिहार की तुलना में अग्रणी राज्य हें ,भला बिहार में वह चालक का काम क्यूँ करेगा।उतरप्रदेश समेत दिल्ली में चालकों की बहुत डिमांड हें और पैसे भी बिहार के अपेक्षा ज्यादा मिलते हें ऐसे में कोई चालक बिहार में क्यूँ ड्राईविंग करेगा ,दरअसल ट्रक मालिक और यातायात पुलिस की नीति से यह संभव हुआ हें।थानाध्यक्ष तों कह ही रहें हें कि यह आरोप निराधार हें लेकिन जांच अगर सही से हो तों पूरे मामले से पर्दा हट जाएगा और सच्चाई बाहर आ जाएगी।
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