महिला सिपाही के ठोकर मामले में एसएसपी के कहने पर दर्ज हुई प्राथमिकी, समझौते की बात पर उठे सवाल ? महिला सिपाही से बाइक की टक्कर के बाद दो युवक भेजे गए जेल ; 60–70 घंटे हाजत में रखने और डेढ़ लाख रुपये मांगने का परिजनों का आरोप
महिला सिपाही के ठोकर मामले में एसएसपी के कहने पर दर्ज हुई प्राथमिकी, समझौते की बात पर उठे सवाल ? महिला सिपाही से बाइक की टक्कर के बाद दो युवक भेजे गए जेल ; 60–70 घंटे हाजत में रखने और डेढ़ लाख रुपये मांगने का परिजनों का आरोप
महिला सिपाही के ठोकर मामले में एसएसपी के कहने पर दर्ज हुई प्राथमिकी, समझौते की बात पर उठे सवाल ?
महिला सिपाही से बाइक की टक्कर के बाद दो युवक भेजे गए जेल ; 60–70 घंटे हाजत में रखने और डेढ़ लाख रुपये मांगने का परिजनों का आरोप
दस्तक 7 मीडिया | संजय कुमार राय
रतनपुरा पुल पर वाहन जांच के दौरान महिला सिपाही के घायल होने और दो युवकों को गिरफ्तार कर जेल भेजने का मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इस मामले में दरभंगा के वरीय पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी ने कहा है कि घटना उनके संज्ञान में आई थी और उनके कहने पर ही प्राथमिकी दर्ज की गई। एसएसपी के मुताबिक, महिला सिपाही और मोटरसाइकिल सवार युवकों के बीच समझौते की बात भी हुई थी, लेकिन सहमति नहीं बनने के बाद प्राथमिकी दर्ज कर दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
एसएसपी के इस बयान के बाद सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि आखिर दोनों पक्षों के बीच समझौते की बात किस आधार पर हो रही थी? क्या यह केवल आपसी सुलह की कोशिश थी या इसके पीछे किसी तरह के लेन-देन का मामला भी था? इस बिंदु पर स्थिति स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर, गिरफ्तार युवकों के परिजनों ने आरोप लगाया है कि दोनों को करीब 60 से 70 घंटे तक थाना हाजत में रखा गया और उनसे डेढ़ लाख रुपये की मांग की गई।
फिलहाल एसएसपी ने स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरू किए जाने की बात नहीं कही है। उन्होंने कहा है कि यदि परिजन शिकायत करते हैं, तो मामले की जांच कराई जाएगी। ऐसे में अब सवाल यह है कि लेंन देन का कथित आरोप जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा ?
एसएसपी के बयान से बढ़े सवाल, समझौते की प्रकृति स्पष्ट होना जरूरी
एसएसपी के अनुसार, मामला उनके संज्ञान में आने के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई। उन्होंने यह भी बताया कि दोनों पक्षों के बीच समझौते की बात हुई थी, लेकिन समझौता नहीं होने पर कानूनी कार्रवाई की गई। हालांकि, उनके बयान से यह स्पष्ट नहीं होता कि समझौते की पहल किसने की थी, बातचीत किन शर्तों पर हुई और सहमति नहीं बनने की वास्तविक वजह क्या थी।
पीड़ित युवकों के परिजन ही इस बातचीत की विस्तृत जानकारी दे सकते हैं। यदि समझौते की बात केवल आपसी सुलह तक सीमित थी, तो उसका स्वरूप स्पष्ट होना चाहिए। वहीं, यदि परिजनों द्वारा लगाए गए कथित रुपये मांगने के आरोप में कोई तथ्य है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच जरूरी है। फिलहाल दोनों पक्षों के बीच बातचीत को लेकर उपलब्ध जानकारी अधूरी है। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना न्याय संगत बात नहीं होगी।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस के अनुसार, 18 अक्टूबर 2026 की रात करीब 8:30 बजे मोरो थाना क्षेत्र के रतनपुरा पुल पर वाहन जांच के दौरान एक मोटरसाइकिल महिला सिपाही से टकरा गई, जिससे वह घायल हो गईं। पुलिस का कहना है कि बाइक की हेडलाइट बंद थी और चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था। वाहन को रोकने की कोशिश के दौरान बाइक सवारों ने भागने का प्रयास किया और मोटरसाइकिल अनियंत्रित होकर महिला सिपाही से टकरा गई।
इस मामले में मोरो थाना कांड संख्या 113/26 दर्ज किया गया। पुलिस ने आशीष कुमार (19) और अखिलेश कुमार को गिरफ्तार किया। प्राथमिकी में सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने समेत अन्य आरोपों का उल्लेख किया गया है। पुलिस के मुताबिक, घटनास्थल के आसपास कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं मिला, जिससे घटना के दृश्य साक्ष्य उपलब्ध होने की संभावना सीमित है।
परिजनों का दावा -टॉर्च की रोशनी से बिगड़ा संतुलन
गिरफ्तार युवकों के परिजनों का कहना है कि वाहन जांच के दौरान पुलिस की टॉर्च की रोशनी चालक की आंखों पर पड़ी, जिससे उसे कुछ क्षणों के लिए सामने देखने में परेशानी हुई। इसी दौरान अचानक ब्रेक लगाने से मोटरसाइकिल असंतुलित होकर गिर गई और महिला सिपाही को चोट लगी। परिजनों का दावा है कि घटना के बाद चालक ने माफी भी मांगी थी।
उनका आरोप है कि इसके बावजूद दोनों युवकों को थाने ले जाकर हाजत में बंद कर दिया गया। परिजनों के मुताबिक, दोनों को 60 से 70 घंटे तक हाजत में रखा गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस दौरान उनसे डेढ़ लाख रुपये की मांग की गई। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे कथित रकम नहीं दे सके, जिसके बाद प्राथमिकी दर्ज कर दोनों को जेल भेज दिया गया।
60–70 घंटे की हिरासत पर दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी स्थिति
इस मामले में हिरासत की अवधि जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है। परिजनों के अनुसार, 18 अक्टूबर की रात दोनों युवकों को थाने लाया गया, 19 अक्टूबर को प्राथमिकी दर्ज की गई और 20 अक्टूबर की देर शाम उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि दोनों की गिरफ्तारी का वास्तविक समय क्या था, गिरफ्तारी मेमो में क्या दर्ज है, थाना डायरी में क्या उल्लेख किया गया और उन्हें न्यायालय के समक्ष कब प्रस्तुत किया गया। प्राथमिकी, गिरफ्तारी संबंधी अभिलेख, थाना डायरी और न्यायालय के दस्तावेजों का मिलान करने से घटनाक्रम की समय-रेखा स्पष्ट हो सकती है।
साथ ही, महिला सिपाही की मेडिकल रिपोर्ट और घटना से जुड़े अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा भी जरूरी है।यदि सिपाही को मोटरसाईकिल से धक्का लगा और वह जख्मी हुई तो अस्पताल की पर्ची तो जरूर होगी ,लेकिन जख्म प्रतिवेदन नहीं होंगा क्यूंकि कहा जा रहा हें कि प्राथमिकी दर्ज कराने के लिये स्थानीय अस्पताल का पर्ची जरूर बनाई होगी ,जिसके बाद ही प्राथमिकी दर्ज करने का रास्ता मिला होंगा ?ऐसे में जख्म प्रतिवेदन का अवलोकन उचित होंगा।
शिकायत मिलने पर ही जांच क्यों? जवाबदेही पर टिकी निगाहें
रतनपुरा पुल की घटना में महिला सिपाही का घायल होना निश्चित रूप से गंभीर है और पुलिस को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन किसी भी कार्रवाई की वैधता, हिरासत की अवधि और आरोपों की निष्पक्षता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। एक ओर पुलिस का कहना है कि समझौता नहीं होने पर प्राथमिकी दर्ज की गई, तो दूसरी ओर परिजन कथित वसूली और लंबी हिरासत के आरोप लगा रहे हैं।
एसएसपी ने शिकायत मिलने पर जांच कराने की बात कही है। अब देखना यह होगा कि परिजन औपचारिक शिकायत करते हैं या नहीं और शिकायत मिलने की स्थिति में जांच कितनी निष्पक्षता से आगे बढ़ती है। कथित डेढ़ लाख रुपये की मांग, समझौते की बातचीत और हिरासत की अवधि तीनों बिंदुओं की अलग-अलग पड़ताल होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि समझौते की बात किस तरह की थी और दोनों युवकों को जेल भेजने से पहले पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं? इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड, संबंधित पक्षों के बयान और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
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