दो डीएसपी के पर्यवेक्षण में विरोधाभास, अब डीआईजी के फैसले पर टिकी पीड़ितों की उम्मीद,

मोरो थाना कांड संख्या 27/26 पर उठे सवाल, छह महीने बाद गिरफ्तारी से बढ़ा विवाद; सीसीटीवी फुटेज और पर्यवेक्षण रिपोर्ट की निष्पक्ष समीक्षा की मांग 

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

जब किसी मामले के पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी डीएसपी स्तर के अधिकारियों के हाथ में हो और उनके ही प्रतिवेदनों में विरोधाभास सामने आने लगे, तो न्याय की उम्मीद लेकर बैठे गरीब और पीड़ित आखिर किसके दरवाजे पर जाएं? दरभंगा में मोरो थाना से जुड़े एक मामले ने पुलिस की जांच प्रक्रिया और पर्यवेक्षण की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस पूरे प्रकरण में पीड़ित पक्ष की निगाहें दरभंगा के डीआईजी की समीक्षा पर टिकी हैं। समीक्षा पूरी हो चुकी है और अब प्रतिवेदन जारी होने का इंतजार है। सवाल यह है कि समीक्षा में यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या पक्षपात सामने आता है, तो क्या उसके खिलाफ कार्रवाई भी होगी?

पुल के एप्रोच से शुरू हुआ विवाद, तीन प्राथमिकी पर सवाल,आरोप यह भी कि थानाध्यक्ष के देख रेख में चल रहा था कथित अवेध खनन 

मामले की शुरुआत पुल के एप्रोच निर्माण को लेकर हुए विवाद से बताई जाती है। विवाद ने धीरे-धीरे तूल पकड़ा और दोनों पक्षों के बीच मारपीट हुई। इसके बाद मोरो थाना में कांड संख्या 19/26, 27/26 और 29/26 दर्ज किए जाने की बात सामने आई। आरोप है कि पुल निर्माण से जुड़ी कंपनी के मुंशी को थानाध्यक्ष की ओर से कथित संरक्षण मिला, जिससे विवाद और गहराता चला गया,और इस विवाद के कारण ही मारपीट हुई।

इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल कांड संख्या 27/26 को लेकर उठ रहा है। पीड़ित पक्ष का दावा है कि इस मामले में घटना हुई ही नहीं थी,और मुंशी के तालमेल में थानाध्यक्ष ने प्राथमिकी दर्ज की  जबकि इसी कांड में बाद में गिरफ्तारी की कार्रवाई भी की गई।

पहले पर्यवेक्षण (27/26 )में मारपीट की घटना से इनकार!

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सदर एसडीपीओ-1 राजीव कुमार ने 23 मार्च 2026 को अपने पर्यवेक्षण में गवाहों के बयान के आधार पर टिप्पणी की थी कि कांड संख्या 27/26 में मारपीट की घटना घटित होने की पुष्टि नहीं होती। उन्होंने कांड संख्या 19/26 और 29/26 को दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट से संबंधित बताया था।

पीड़ित पक्ष का कहना है कि शुरुआती पर्यवेक्षण में स्पष्ट टिप्पणी किए जाने के बावजूद लगभग छह महीने बाद इसी मामले में अचानक गिरफ्तारी की कार्रवाई की गई। इससे पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे। अब यह जानना जरूरी है कि बाद में ऐसा कौन-सा नया साक्ष्य सामने आया, जिसके आधार पर पूर्व पर्यवेक्षण से अलग कार्रवाई की गई।

दूसरे पर्यवेक्षण में कैसे बदल गया जांच का रुख?

बताया जाता है कि सदर एसडीपीओ-1 के प्रशिक्षण पर बाहर रहने के दौरान पर्यवेक्षण का जिम्मा एसडीपीओ-2 को मिला था। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि दूसरे पर्यवेक्षण में प्राथमिकी में वर्णित तथ्यों से आगे बढ़कर ऐसी बातें भी शामिल की गईं, जिनकी घटनास्थल पर जांच नहीं की गई थी। आरोप यह भी है कि घटनास्थल का निरीक्षण किए बिना प्रतिवेदन तैयार कर दिया गया।

इन आरोपों की पुष्टि संबंधित पर्यवेक्षण प्रतिवेदनों, केस डायरी और घटनास्थल के साक्ष्यों के मिलान से ही हो सकती है। यदि वास्तव में दोनों अधिकारियों के निष्कर्षों में गंभीर विरोधाभास है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय है कि दोनों निष्कर्ष किन साक्ष्यों के आधार पर निकाले गए।

सीसीटीवी फुटेज से खुल सकता है मामले का राज

इस प्रकरण में सीसीटीवी फुटेज की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है। पीड़ित पक्ष का दावा है कि तीनों कांडों से संबंधित समयावधि के फुटेज देखने पर कांड संख्या 27/26 में वर्णित घटना की पुष्टि नहीं होती। शुरुआती पर्यवेक्षण में भी घटनास्थल का सीसीटीवी फुटेज प्राप्त कर उसका विश्लेषण केस डायरी में दर्ज करने का निर्देश दिए जाने की बात कही गई है।

ऐसे में सवाल है कि फुटेज प्राप्त किया गया या नहीं? उसका विधिवत विश्लेषण हुआ या नहीं? यदि हुआ, तो उसके निष्कर्ष केस डायरी और बाद के पर्यवेक्षण प्रतिवेदन में किस रूप में दर्ज हैं?

पीड़ित पक्ष के अनुसार, कांड संख्या 19/26 में जिस समय की घटना का उल्लेख है, उसी समय का जिक्र कांड संख्या 27/26 में भी किया गया है। उनका दावा है कि संबंधित व्यक्ति उस समय मारपीट में घायल था, उसे थाने पर बैठाए जाने के बाद डीएमसीएच भेजा गया था। ऐसे में एक ही व्यक्ति की अलग-अलग स्थानों पर मौजूदगी के दावे की समय, स्थान, चिकित्सकीय अभिलेख और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जांच जरूरी है।

पीड़ित पक्ष का यह भी कहना है कि एक पक्ष की ओर से तत्काल प्राथमिकी दर्ज कराई गई, जबकि दूसरे पक्ष के घायल व्यक्ति के डीएमसीएच में भर्ती रहने और फर्दबयान के बाद कांड संख्या 29/26 दर्ज हुआ। उनका दावा है कि वास्तविक मारपीट से संबंधित मामले यही दो थे। हालांकि, तीसरे कांड की वास्तविकता पर अंतिम निष्कर्ष साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

अब डीआईजी की समीक्षा पर टिकी निगाहें

पीड़ित पक्ष ने कथित विसंगतियों की समीक्षा कर न्याय दिलाने के लिए दरभंगा के डीआईजी से अनुरोध किया था। बताया जाता है कि डीआईजी स्तर पर मामले की समीक्षा की जा चुकी है और अब प्रतिवेदन जारी होने की प्रतीक्षा है।

इस मामले में तीन प्रमुख सवालों का जवाब जरूरी है क्या कांड संख्या 27/26 में वर्णित घटना के पर्याप्त साक्ष्य हैं? क्या दोनों पर्यवेक्षण प्रतिवेदनों के विरोधाभास का कारण स्पष्ट किया गया है? और क्या जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज, चिकित्सकीय अभिलेख तथा गवाहों के बयानों का निष्पक्ष परीक्षण हुआ है?

मामले में जातिगत पक्षपात और पुलिसकर्मियों की मिलीभगत के आरोप भी लगाए गए हैं।

अब असली परीक्षा डीआईजी की है। समीक्षा का उद्देश्य केवल फाइल पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर सही निष्कर्ष तक पहुंचना और यदि किसी अधिकारी की भूमिका में गंभीर अनियमितता प्रमाणित हो, तो नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करना भी है। पीड़ितों को उम्मीद है कि समीक्षा प्रतिवेदन में उठाए गए सवालों का स्पष्ट जवाब मिलेगा। अब देखना है कि इस मामले में न्याय की उम्मीद मजबूत होती है या पुलिस की जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल और गहरे होते हैं।एप्रोच की शिकायत को लेकर पीड़ित पक्ष ने दरभंगा के सभी पदाधिकारी समेत लोक जन शिकायत में भी शिकायत दर्ज करायी थीं ,कारवाई जब होने लगी तो शिकायत कर्ता को निशाना बना दिया गया और पीड़ित इसके बाद दर दर की ठोकरें खाता रहा उसकी किसी ने नहीं सुनी जबकि वादी पक्ष के पास जख्म प्रतिवेदन डीएमसीएच का था ही नहीं और अगर था तो गहरा नहीं था बावजूद क्या कारण रहा कि दोषी पक्ष ही सब पर भारी रहा ?हालांकि एसडीपीओ 1का पर्यवेक्षण सही दिशा में था जिसे प्रभार में रहें एसडीपीओ ने अलग रंग दें दिया।