नौकरी बचाने की जद्दोजहद में जान जोखिम में डाल बैठा जवान, छत से कूदे पुलिसकर्मी और फरार आरोपी; गनीमत रही कि दोनों बच गए, 30 सीलबंद टेट्रा पैक शराब के साथ पकड़े गए विजय के फरार होने के बाद आधी रात तक चला पीछा, कर्तव्य निभाने की कोशिश में गृह रक्षक ने भी लगा दी जान की बाजी
नौकरी बचाने की जद्दोजहद में जान जोखिम में डाल बैठा जवान, छत से कूदे पुलिसकर्मी और फरार आरोपी; गनीमत रही कि दोनों बच गए, 30 सीलबंद टेट्रा पैक शराब के साथ पकड़े गए विजय के फरार होने के बाद आधी रात तक चला पीछा, कर्तव्य निभाने की कोशिश में गृह रक्षक ने भी लगा दी जान की बाजी
नौकरी बचाने की जद्दोजहद में जान जोखिम में डाल बैठा जवान, छत से कूदे पुलिसकर्मी और फरार आरोपी; गनीमत रही कि दोनों बच गए,
30 सीलबंद टेट्रा पैक शराब के साथ पकड़े गए विजय के फरार होने के बाद आधी रात तक चला पीछा, कर्तव्य निभाने की कोशिश में गृह रक्षक ने भी लगा दी जान की बाजी
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
वर्दी की जिम्मेदारी, नौकरी बचाने की चिंता और ड्यूटी में हुई चूक को सुधारने का दबाव कभी-कभी किसी जवान को ऐसे जोखिम के सामने खड़ा कर देता है, जहां एक छोटी-सी चूक जिंदगी भर का दर्द बन सकती है। कोतवाली थाना क्षेत्र में शराब तस्करी के आरोपित विजय कुमार सहनी को पकड़ने के लिए बीती रात जो कुछ हुआ, वह पुलिसकर्मियों की कर्तव्यनिष्ठा के साथ-साथ उनकी सुरक्षा और कार्यप्रणाली को बेहतर बनाता हें ,पिताजी का श्राध कर्म कर वह जवान कोतवाली थाना आया ही था ,कि ऐसी घटना हो गई।
मामला 30 सीलबंद टेट्रा पैक शराब की बरामदगी से जुड़ा था। पुलिस ने विजय को पकड़ा था, लेकिन शौचालय जाने के बहाने उसने ड्यूटी पर तैनात गृह रक्षक को धक्का दिया और पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गया। एक तरफ शराब बरामदगी का मामला था, तो दूसरी तरफ आरोपी के भाग निकलने की घटना ने गृह रक्षक के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी। देखते ही देखते मामला केवल एक फरार आरोपी को पकड़ने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस की प्रतिष्ठा और सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ गया।
बताया जाता है कि विजय के फरार होने के बाद कोतवाली थानाध्यक्ष ने उसे दोबारा पकड़ने को प्राथमिकता दी। ओडी पदाधिकारी और गृह रक्षक उसकी तलाश में जुट गए। पुलिस पीछा करती रही, लेकिन विजय गलियों का सहारा लेकर अपने घर पहुंच गया। पुलिस जब उसके घर पहुंची तो वह छत पर चला गया। उसे पकड़ने की कोशिश में गृह रक्षक भी छत पर चढ़ गया।
इसके बाद जो हुआ, वह किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। पुलिस से बचने के लिए विजय छत से नीचे कूद गया। उसके पीछे गृह रक्षक ने भी छलांग लगा दी। जमीन पर पानी होने के कारण दोनों को गंभीर चोट लगने से बचाव हो गया। यह महज संयोग था कि उस रात एक पुलिसकर्मी की जान पर नहीं बन आई ? यदि नीचे की जमीन कठोर होती या गिरने का तरीका थोड़ा भी अलग होता, तो परिणाम बेहद भयावह हो सकता था।
एक आरोपी को दोबारा पकड़ने की कोशिश में गृह रक्षक ने जिस तरह अपनी जान जोखिम में डाली, वह घटना का सबसे संवेदनशील पहलू है। आखिर ड्यूटी निभाने वाले जवान की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या एक फरार आरोपी को पकड़ने के लिए इस हद तक जोखिम उठाना जरूरी था? क्या ऐसी परिस्थितियों में जवानों को सुरक्षित तरीके से कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं?
गृह रक्षक के मन में उस समय क्या चल रहा था, यह कहना मुश्किल है। संभव है कि वह अपनी ड्यूटी में हुई चूक को सुधारना चाहता हो और आरोपी को दोबारा पकड़कर अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहता हो। लेकिन किसी भी जवान की जान इतनी सस्ती नहीं हो सकती कि नौकरी या विभागीय जवाबदेही के दबाव में उसे छत से छलांग लगाने जैसी जोखिम भरी स्थिति का सामना करना पड़े।
इस घटनाक्रम में दो प्राथमिकी दर्ज होने की बात सामने आई है। पहली प्राथमिकी शराब बरामदगी से संबंधित है, जबकि दूसरी पुलिस अभिरक्षा से विजय के फरार होने को लेकर दर्ज की गई। दोनों मामलों में कानूनी प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन घटना ने पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, अभिरक्षा व्यवस्था और जोखिम भरी कार्रवाई की जरूरत पर विचार करने का अवसर भी दिया है।
सवाल कार्रवाई का नहीं, जवान की सुरक्षा का भी है। पुलिस का कर्तव्य अपराधियों को पकड़ना और कानून लागू करना है, लेकिन इस जिम्मेदारी को निभाते समय पुलिसकर्मियों की जान की हिफाजत भी उतनी ही जरूरी है। उस रात गृह रक्षक और विजय दोनों बाल-बाल बच गए। अब जरूरी है कि घटना के तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा हो, सुरक्षा में हुई चूक की जिम्मेदारी तय हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी जवान को अपनी नौकरी बचाने की चिंता में अपनी जान दांव पर न लगानी पड़े।अब उसे इस बात का डर हें कि इतना मेहनत करने के बाद भी कहीं वरीय पुलिस पदाधिकारियों के कोपभाजन हो जाय ,क्यूंकि चूक तो हुई लेकिन उस चूक की भरपाई उसने जरूर कर दी।