ऐतिहासिक धरोहर पर अवैध कब्जे का साया, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दुर्दशा का शिकार हुआ बिरौल का खादी ग्रामोद्योग संघ
ऐतिहासिक धरोहर पर अवैध कब्जे का साया, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दुर्दशा का शिकार हुआ बिरौल का खादी ग्रामोद्योग संघ
ऐतिहासिक धरोहर पर अवैध कब्जे का साया, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण दुर्दशा का शिकार हुआ बिरौल का खादी ग्रामोद्योग संघ
दस्तक 7 मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा
कभी जहां चरखे की मधुर झंकार, खादी कपड़े बुनने वाली मशीनों की गड़गड़ाहट और रंगाई के रंगों की रौनक हुआ करती थी, आज वह ऐतिहासिक खादी ग्रामोद्योग संघ परिसर पानी और जलकुंभी का अड्डा बनकर रह गया है। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और खादी ग्रामोद्योग संघ की घोर अनदेखी के कारण महात्मा गांधी के स्वावलंबन के प्रतीक इस धरोहर पर अब अवैध कब्जे का काला साया मंडरा रहा है।
यह ऐतिहासिक परिसर पहले अफजला पंचायत के अंतर्गत आता था, जो अब नगर पंचायत बिरौल के क्षेत्राधिकार में शामिल हो चुका है। सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था का ढांचा बदला, लेकिन इस धरोहर की बदहाली नहीं बदली। पंचायती राज व्यवस्था के दौरान परिसर के सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार के नाम पर कई बार कागजों और योजनाओं में ‘मिट्टीकरण कार्य’ के दावे किए गए। लाखों का फंड बहाया गया, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है। परिसर में पसरा गंदा पानी, उगी हुई जलकुंभी और खंडहर बनते भवन खुद अपनी बदहाली की गवाही दे रहे हैं। स्थानीय प्रशासन से लेकर खादी ग्रामोद्योग संघ का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी इस धरोहर को स्वच्छ बनाने, इसे अवैध कब्जे से मुक्त कराने या इसके सौंदर्यीकरण को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रहा है। जिस खादी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को ऊर्जा दी, उसी की विरासत आज अपनों की ही बेरुखी के कारण घुट-घुट कर दम तोड़ रही है।
यदि समय रहते स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने इस ओर ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह ऐतिहासिक स्थल केवल पन्नों और तस्वीरों तक ही सीमित रह जाएगा। स्थानीय ग्रामीणों और बुद्धिजीवियों ने जिला प्रशासन से अविलंब परिसर से अवैध कब्जा हटाने, जलजमाव की समस्या से निजात दिलाने और खादी भंडार के सौंदर्यीकरण की पुरजोर मांग कर रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन इस परिसर को अपने अधीन लेकर सरकारी कार्य में उपयोग करने लगें तो धरोहर को बचाया जा सकता है। अन्यथा—।