आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित, सुनवाई पूरी,

डीएम जी. कृष्णैया हत्याकांड में रिहाई पर उठे सवाल, कोर्ट ने कहा— सरकारी कर्मचारी की हत्या को ‘दुर्लभतम’ मामला क्यों नहीं माना गया?

दस्तक 7मीडिया /दिल्ली 

पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने दिवंगत आईएएस अधिकारी एवं तत्कालीन गोपालगंज डीएम जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया, बिहार सरकार, आनंद मोहन और राज्य सजा माफी बोर्ड की ओर से रखी गई दलीलों को सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रखा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से कई अहम सवाल पूछे। अदालत ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि ड्यूटी पर तैनात एक सरकारी कर्मचारी की हत्या को ‘दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामलों में क्यों नहीं माना गया। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में राहत देने से समाज में गलत संदेश जा सकता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ सकता है।

कोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा कि जब समय-पूर्व रिहाई के लिए आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी नहीं थीं, तब आनंद मोहन को रिहा कैसे किया गया। साथ ही यह भी जानना चाहा कि क्या राज्य सजा माफी बोर्ड को आनंद मोहन के खिलाफ लंबित अन्य मामलों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराई गई थी।

यह मामला वर्ष 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या से जुड़ा है। इस मामले में आनंद मोहन को दोषी ठहराया गया था। वर्ष 2007 में मुजफ्फरपुर की ट्रायल कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे 2008 में पटना हाई कोर्ट ने कठोर आजीवन कारावास में बदल दिया। वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।

बिहार सरकार ने अप्रैल 2023 में जेल मैनुअल में संशोधन कर ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या से जुड़े प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद 27 अप्रैल 2023 को करीब 16 वर्ष की सजा पूरी करने के बाद आनंद मोहन को सहरसा जेल से समय-पूर्व रिहा कर दिया गया। इसी निर्णय और नियमों में किए गए संशोधन को उमा कृष्णैया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि आजीवन कारावास का अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास होता है, जिसे केवल 14 या 16 वर्ष की अवधि तक सीमित नहीं किया जा सकता।

अब सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षित फैसले पर सबकी निगाहें टिकी हैं। अदालत का अंतिम निर्णय यह तय करेगा कि आनंद मोहन की समय-पूर्व रिहाई वैध मानी जाएगी या उन्हें दोबारा जेल जाना होगा।