दरभंगा ,संजय कुमार राय
बिहार मे यह कैसी पुलिसिंग हो रही हैं ?इसे लेकर कई जगहों से सवाल खड़े हो रहें हैं ?यह सवाल भी लाजमी हैं और हकीकत भी । पुलिसिंग के तरीके बदल गये हैं। तरीका कोई सही रास्तों पर नहीं ,सिर्फ गलत रास्तों को ही पुलिस अपना रही हैं। बिहार मे बस कुछ एसपी को छोड़ दीजिये तो ज्यादातर एसपी के यहीं हाल हैं। ऐसा लग रहा हैं कि अब आईपीएस को प्रशिक्षण के दौरान शायद इसी रूप मे प्रशिक्षण दिया जा रहा हैं ?शायद इसी का नतीजा हैं कि अब काम करने के तरीके बदल गये हैं ,और यही कारण हैं कि लोग कह रहें हैं कि जंगल राज का आगाज हैं।
जंगल राज कोई राजद या जेडीयू के गठबंधन के कारण नहीं हैं अगर दूसरी पार्टी का भी पदार्पण राज्य मे होता हैं तो परिस्थितियां कुछ ऐसी ही होगी तब तक जबतक सरकार की नीयत ठीक नहीं हो जाती?सरकार कोई भी हो यह सिलसिला अब चलता रहेगा और आम जनता घुन की तरह पीसती रहेंगी । किसी के द्वार पर जानें से ,थाना मे पानी पिलाने से ,जनता के साथ दोस्ती बनाने से पुलिसिंग बेहतर नहीं हो सकती इसके लिये पुलिस के गलत कार्यशैली और अनुशासन का होना जरूरी हैं। और इस विभाग मे अनुशासन भी खत्म होता ही दिखाई पड़ रहा हैं। बस नाम के लिये पद हैं और पद के लिये नाम हैं।
डीजीपी राजविंदर सिंह भट्टी के डीजीपी पद पर योगदान के बाद राज्य के विभिन्न जिलों मे ऊंचे पदों पर आसीन पदाधिकारियों के पसीने छूट रहें थे लेकिन कुछ ही दिनों मे टांय टांय फिस्स फिस्स हो गया।ऐसा क्यू हुआ यह सोचने और समझने की बात हैं। वरना डीजीपी श्री भट्टी वह नाम था कि बड़ो बड़ो के पसीने छूट जाते थे ,अपराधी इलाके को छोड़कर अपना नाम बदल देते थे।
डीजीपी भट्टी साहब ,हम लोग भी बहूत पुराने पत्रकार हैं ,और करीब तीन दशक से ऊपर के दिनों से पत्रकारिता कर रहें हैं। कई डीजीपी आयें और सेवा निवृत हो गये । आप ही बताईये कि क्या पुलिसिंग के यही तौर तरीके हैं ?समय था कि एक एफआईआर नहीं करने पर अधिकारी निलंबित हो जाते थे और अब एक एफआईआर क्या हजारों पीड़ित अपना आवेदन लेकर थाने से लेकर आईजी तक भटकते रहते हैं लेकिन उनका एफआईआर दर्ज नहीं होता।अब जैसा एफआईआर का मजमून वैसे पैसों की वसूली । दर बदर भटकते लोग मिल जाएंगे । कोई सामाजिक कार्यकर्ता अगर ऐसे मामलों मे पहल कर दिया या जानकारी जुटाई तो उसे गोली मार दी जाती हैं ,झूठे मुकदमों मे फंसाया जाता हैं और उसपर एफआईआर मे देरी नहीं होती ,वजह यही कि फिर आवाज उठाने वाला कोई नहीं हो। कई जिलों मे थाने की बोली लगती हैं और थाने की खरीद पुलिस अधिकारी करते हैं। ऐसे पुलिस अधिकारी जब थानाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते हैं तो थाना से संबंधित प्रत्येक कामों की बोली लगती हैं। अब जैसे उदाहरण ले लीजिये जैसे किसी का दो करोड़ किसी ने ठग लिया तो स्वाभाविक हैं कि एफआईआर दर्ज कराने जाएगा। जब वह व्यक्ति थाना पर जाकर आवेदन देगा तो थानेदार एफआईआर दर्ज करने के बजाय उल्टे उसी से सवाल करेगा। फिर थक हारकर वह घर जाएगा। इतने मे किसी दलाल का फोन जाएगा। दलाल कहेगा कि सर दो करोड़ की ठगी हैं ,दस लाख दीजिये एफआईआर दर्ज हो जायगा। अगर कम ज्यादा कराके पीड़ित एफआईआर दर्ज करा भी लिया तो फिर अनुसंधानकर्ता का नंबर आ जाता हैं। अब अनुसंधानकर्ता को वरीय पदाधिकारियों का आदेश निर्देश चाहिये तो पर्यवेक्षण रिपोर्ट जरूरी हैं। अब पर्यवेक्षणकर्ता के यहां से पीड़ित को फोन जाता हैं और बुलाया जाता हैं ,बातचीत होती हैं फिर कहा जाता हैं कि दो करोड़ का बीस प्रतिशत दीजिये आपका आरोपी भी पकड़ मे आ जाएगा और पैसा भी दिला देंगे। अब दो करोड़ का बीस प्रतिशत यानि 40लाख रुपये। फिर कहा जाएगा कि इस टोकन मनी का 25प्रतिशत यानि दस लाख रुपये दीजिये तो आपका सारा काम हम कर देंगे बांकी बचे पैसे काम होने के बाद दीजियेगा। अब यही से आरोपी पक्ष के पास फोन जाएगा और कहा जाएगा कि इतना रुपया ठगे हो बस बीस प्रतिशत दें दो तुमको हम बचा देंगे।यानि पैसों की बरसात।जिसने पैसों मे कमी की उनका तो दिन ही खराब हो गया। हत्या जैसे गंभीर मामलों मे नामजद अभियुक्त से पैसे का लेन देंन कर उसे लाभ पहुंचाया जाता हैं और यही कारण हैं कि बिहार मे हत्याओं का सिलसिला जारी हैं। कहीं किसी को गोली मार दी जाती तो कहीं चाकू छुरी से वार कर मौत के घाट उतार दिया जाता हैं।कुछ दशक पहले तक वरीय पदाधिकारी कांडों की समीक्षा करते थे अब यह समीक्षा नहीं होती। प्रक्षेत्र से क्षेत्र होने के बाद एसपी और आईजी का बेहतर तालमेल हो जाता हैं इसके बाद खेल शुरू हो जाता हैं। थाना से लेकर एसपी तक की मनमर्जी चलती हैं और उसका लाभ आईजी तक पहुंचता हैं। चर्चा तो यह भी हैं कि कई क्षेत्र के आईजी प्रत्येक थाना को मासिक रकम तय कर दिये हैं और थानाध्यक्ष /ओपी अध्यक्ष प्रत्येक महीने इस रकम को दलालों के मार्फत साहब तक पहुंचाते हैं। अब इस लेन देंन मे किसी का हिम्मत हैं कि कोई पुलिस पदाधिकारी अपने एसपी और आईजी के खिलाफ बोलेगा ?हाँ कभी कभी कहीं से कोई ऑडियो /विडिओ वाईरल हुआ तो संबंधित अधिकारी का खैर नहीं।
अब सवाल उठता हैं कि ऐसे मे पीड़ित को न्याय देने की बात की जाय तो सरासर बेईमानी हैं। ऐसे मे पानी पिलाना उसके घर जाना ,मोबाईल की बरामदगी कर देना कुछ हद तक तो सही लगता हैं लेकिन उन पीड़ितों से जाकर पूछिये जिनके ऊपर पुलिसिया तंत्र का आर्थिक उगाही का गोली छोड़ा गया हो और अधेड़ मे लटका खड़ा हो।
और भी कई विषय वस्तु हैं डीजीपी महोदय ,समय समय पर अवगत कराते रहेंगे। एक पत्रकार का काम सूचना संग्रह कर आप तक या अन्य पदाधिकारियों तक पहुंचाना हैं। आप इसे सही समझे तो पुलिस के कार्यशैली के तरीकों मे बदलाव लाइये। आप मे वह क्षमता हैं कि दस दिनों के भीतर पुलिस की क्षमता को सही दिशा मे ला सकते हैं और अपराधियों का खात्मा भी कर सकते हैं। आपसे आज भी लोंगों को उम्मीद हैं।ईश्वर सबको मौका नहीं देते जो मौका आपको मिला हैं।
कई पुलिस पदाधिकारी शराब माफिया ,अवैध बालू खनन मे लिप्त हैं।बड़ी कमाई का श्रोत हैं।कोई भी पुलिस पदाधिकारी समय का इंतजार नहीं करना चाहता हैं बस इनकी यही चाहत हैं कि एक महीने मे करोड़पति कैसे बन जाय।डीजीपी भट्टी साहब ,आप एसपी आईजी की बात को फिलहाल दूर रखिये ,एक एक थानेदार कम दिनों मे करोड़पति हैं ,आप चिन्हित तो कीजिये ,फिर पता चलेगा।पुलिस इन दिनों वह सारा काम करती हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिये।आम जनता का भरोसा पुलिस हैं।छोटे बड़े सभी कामों मे पुलिस की भूमिका अव्वल हैं।सर ,विभाग को सुधारिये।या फिर लोकतंत्र को जिंदा रखिये ,आज के दिनों मे भी ऐसे पत्रकार हैं जो सच्चाई से अवगत कराते रहते हैं ,कुछ नहीं तो खबरों की जांच कराकर दोषी पुलिस पदाधिकारियो पर कारवाई कीजिये बस इतने मे भी विभाग को बदलते देर नहीं लगेगी।
अगले दिन फिर से ———-+
