दरभंगा के युवाओं ने पेश की इंसानियत की मिसाल, बदहाली की बेड़ियों में जकड़ी जिंदगी को मिला सम्मान का नया सवेरा
दरभंगा के युवाओं ने पेश की इंसानियत की मिसाल, बदहाली की बेड़ियों में जकड़ी जिंदगी को मिला सम्मान का नया सवेरा
दरभंगा के युवाओं ने पेश की इंसानियत की मिसाल, बदहाली की बेड़ियों में जकड़ी जिंदगी को मिला सम्मान का नया सवेरा
दस्तक7मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।
कहते हैं कि सेवा ही परमो धर्म है, लेकिन जब यह सेवा किसी ऐसे व्यक्ति की हो जिसे समाज ने ‘पागल’ करार देकर त्याग दिया हो, तो वह ईश्वर की इबादत बन जाती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है बिरौल के युवा समाजसेवी राघव झा और उनकी टीम ने। गंदगी से सने शरीर, उलझे हुए बाल और समाज की बेरुखी के बीच सड़कों पर दम तोड़ती मानवीय गरिमा को इन युवाओं ने न केवल बचाया, बल्कि उसे नया जीवन भी दिया। अनदेखी की पराकाष्ठा और एक युवा का संकल्प पिछले कई दिनों से बिरौल की सड़कों पर एक मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति अत्यंत दयनीय स्थिति में घूम रहा था। भूख, प्यास और फटे हाल कपड़ों में लिपटे उस व्यक्ति की ओर देखने वाला कोई न था। लोग पास से गुजरते, पर उसकी सुध लेने की फुर्सत किसी को न थी। हाटी गांव के निवासी राघव झा की नजर जब इस बेबस शख्स पर पड़ी, तो उन्होंने सहानुभूति दिखाने के बजाय ‘सेवा’ का मार्ग चुना।
राघव झा ने अपनी टीम के सदस्यों—पारस कुमार साहनी, सूरज कुमार सिंह, गौरी शंकर,मो.कलाम, रुपचन्द्र झा और अभिषेक कुमार चौधरी के साथ मिलकर उस व्यक्ति की सुध ली। युवाओं ने खुद अपने हाथों से उस व्यक्ति के जटा बन चुके बालों को काटा और दाढ़ी बनाई। उसे नहलाकर साफ-सुथरे नए कपड़े पहनाए। इतना ही नहीं बड़े ही प्रेम और आदर के साथ उसे भरपेट भोजन कराया। सालों की उपेक्षा झेल रहे उस व्यक्ति के चेहरे पर जब मुस्कान आई, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गई। यह केवल सफाई नहीं, बल्कि एक इंसान को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाने का प्रयास था। इस नेक कार्य के बाद राघव झा ने समाज को एक कड़ा संदेश देते हुए कहा, मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग हमारे समाज का हिस्सा हैं, बोझ नहीं। उन्हें जंजीरों या तिरस्कार की नहीं, बल्कि जज्बात और थोड़े से प्यार की जरूरत है। हम उन्हें ‘पागल’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते। राघव की टीम का सेवा भाव यहीं नहीं थमा है। अब उनका अगला संकल्प उस व्यक्ति की पहचान कर उसे उसके परिवार से मिलाना है। टीम का मानना है कि अपनों का साथ ही उसकी मानसिक स्थिति को पूरी तरह सुधार सकता है। बिरौल की यह घटना साबित करती है कि आज भी समाज में इंसानियत जिंदा है। राघव और उनके साथियों का यह निस्वार्थ कार्य उन सभी युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं।