हरिनगर कांड: पुलिस की निष्क्रियता से बढ़ा विवाद या एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग? दो प्राथमिकी, एक गांव और कई सवाल
हरिनगर कांड: पुलिस की निष्क्रियता से बढ़ा विवाद या एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग? दो प्राथमिकी, एक गांव और कई सवाल
हरिनगर कांड: पुलिस की निष्क्रियता से बढ़ा विवाद या एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग? दो प्राथमिकी, एक गांव और कई सवाल
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
हरिनगर गांव में 30 और 31 जनवरी 2026 को हुई घटनाओं ने न केवल गांव का माहौल बिगाड़ा, बल्कि पुलिस की भूमिका और एससी/एसटी एक्ट के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि कुशेश्वरस्थान थाना पुलिस समय रहते सक्रिय होती, तो न तो मारपीट की नौबत आती और न ही सैकड़ों लोगों को अभियुक्त बनाया जाता।
मामले की शुरुआत 30 जनवरी 2026 को दिए गए एक आवेदन से मानी जा रही है। आरोप है कि उस दिन पुलिस यदि घटनास्थल पर पहुंचकर स्थिति को संभाल लेती, तो अगले दिन यानी 31 जनवरी को दोनों पक्षों के बीच मारपीट की घटना नहीं होती। इसी क्रम में 30 जनवरी को हेमकांत झा के बयान पर थाना कांड संख्या 21/26 दर्ज की गई, जिसमें सीमित संख्या में अभियुक्त नामजद हैं।
लेकिन अगले ही दिन, 31 जनवरी 2026 को अशर्फी पासवान द्वारा दर्ज कराई गई दूसरी प्राथमिकी (कांड संख्या 22/26) ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। इस एफआईआर में 70 नामजद और 100–150 अज्ञात अभियुक्त बनाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इससे पूरा हरिनगर गांव एससी/एसटी एक्ट के दायरे में आ गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि दूसरी प्राथमिकी में कई ऐसे लोगों को भी अभियुक्त बनाया गया है जो घटना के समय गांव में मौजूद ही नहीं थे।कुछ दिल्ली, तो कुछ मुंबई जैसे शहरों में रहते हैं। उनका कहना है कि यह जानबूझकर गांव के लोगों को भयभीत और प्रताड़ित करने की कोशिश है।
एक बड़ा सवाल पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी उठ रहा है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब दोनों पक्षों की ओर से प्राथमिकी दर्ज है, तो अब तक गिरफ्तारी सिर्फ एक ही पक्ष से क्यों हो रही है? क्या यह एकतरफा कार्रवाई नहीं है? इसे लेकर स्थानीय पुलिस की मंशा पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
वहीं, घटना से जुड़े वायरल वीडियो और तकनीकी साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच की मांग भी जोर पकड़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि बिंदुवार तरीके से वीडियो फुटेज, कॉल डिटेल्स और घटनास्थल की परिस्थितियों की जांच हो, तो स्पष्ट हो जाएगा कि विवाद की शुरुआत किस पक्ष ने की थी।
इस पूरे मामले में नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ स्थानीय नेता आग बुझाने के बजाय बयानबाज़ी से हालात और बिगाड़ रहे हैं, जबकि जरूरत थी दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने और दोषियों को चिन्हित कर कार्रवाई करने की,चाहे दोषी किसी पक्ष का हो ?
मामले पर वरीय पुलिस अधीक्षक जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी ने स्पष्ट कहा है कि निर्दोष लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। पुलिस वीडियो फुटेज, तकनीकी साक्ष्य और अन्य तथ्यों के आधार पर न्यायसंगत कार्रवाई करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
वहीं बिरौल के एसडीपीओ प्रभाकर तिवारी ने बताया कि दोनों पक्षों के आवेदन पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच और पर्यवेक्षण में जो तथ्य सामने आएंगे, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। उन्होंने खुद को निर्दोष मानने वाले लोगों से आवेदन देने की अपील भी की है ताकि जांच के क्रम में उन्हें सहूलियत हो ,उन्होंने कहा कि जो भी कारवाई होगी वह न्याय संगत होगी और कानून के दायरे में भी।
हरिनगर के सैकड़ों ग्रामीणों का कहना है कि इस पूरे प्रकरण में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग किया जा रहा है। वहीं दूसरा पक्ष आरोप लगाता है कि उनके साथ घर में घुसकर और सड़कों पर मारपीट की गई। हालांकि एक पक्ष इस बात पर सहमत दिखते हैं कि यदि 30 जनवरी को ही पुलिस सक्रिय हो जाती, तो हालात इतने नहीं बिगड़ते।
अब सवाल यह है कि क्या पुलिस की शुरुआती लापरवाही ने विवाद को बढ़ाया, या फिर कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया गया? जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।