दरभंगा महाराज की परंपरा को मिला नया वारिस कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास ट्रस्ट की कमान संभाली युवराज राजेश्वर–कपिलेश्वर ने
दरभंगा महाराज की परंपरा को मिला नया वारिस कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास ट्रस्ट की कमान संभाली युवराज राजेश्वर–कपिलेश्वर ने
दरभंगा महाराज की परंपरा को मिला नया वारिस कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास ट्रस्ट की कमान संभाली युवराज राजेश्वर–कपिलेश्वर ने
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
मिथिलांचल की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के इतिहास में एक नया मोड़ आया है। दरभंगा महाराज की परंपरा से जुड़े कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास ट्रस्ट को अब औपचारिक रूप से नया नेतृत्व मिल गया है। महारानी अधिरानी कामसुंदरी साहिबा के निधन (12 जनवरी 2026) के बाद महाराजा कामेश्वर सिंह के वंशज युवराज राजेश्वर सिंह और युवराज कपिलेश्वर सिंह ने ट्रस्ट का दायित्व संभाल लिया है।
इससे पहले सितंबर 2025 में दरभंगा सिविल कोर्ट ने दशकों पुराने विवाद पर विराम लगाते हुए दोनों भाइयों को ट्रस्ट का कानूनी ट्रस्टी घोषित किया था। न्यायालय के फैसले के बाद परंपरागत रीति-रिवाज और विधि-विधान के साथ दोनों युवराजों ने न्यास का कार्यभार ग्रहण किया।
देवी दरबार में पूजा, लिया सेवा का संकल्प
पदभार संभालने के बाद युवराज राजेश्वर सिंह और युवराज कपिलेश्वर सिंह ने दरभंगा स्थित मां श्यामा, मां तारा और कंकाली माता के मंदिरों में पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। उन्होंने कहा कि वे महाराजा कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित धार्मिक संस्थाओं की मर्यादा और परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाएंगे।
देश-विदेश के मंदिरों के विकास पर रहेगा फोकस
दोनों ट्रस्टियों ने बताया कि न्यास का उद्देश्य केवल संपत्तियों का प्रबंधन नहीं है, बल्कि मिथिला की आस्था, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को सहेजना है। ट्रस्ट से जुड़े देश और विदेश में स्थित मंदिरों और धार्मिक स्थलों के जीर्णोद्धार, संरक्षण और विकास के लिए चरणबद्ध योजना बनाई जाएगी।
पारदर्शिता और लोकहित पर जोर
युवराज राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह ने कहा कि ट्रस्ट की सभी गतिविधियां पारदर्शिता, सेवा भावना और लोकहित के सिद्धांतों पर संचालित होंगी। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी नई गति दी जाएगी।
मिथिलांचल में नई उम्मीद
स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का मानना है कि युवराजों के नेतृत्व में कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास ट्रस्ट को नई दिशा मिलेगी। इसे मिथिलांचल में धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।