यूपी के अपराधियों का ‘सेफ जोन’ बनता बिहार: खुफिया तंत्र की नाकामी और क्राइम ब्रांच के पुनर्गठन की सलाह

दस्तक7मिडिया  /पटना।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ चलाए जा रहे सख्त अभियानों (“बुलडोजर एक्शन” और एनकाउंटर) के डर से, शातिर अपराधी अब पड़ोसी राज्य बिहार को अपनी शरण स्थली बना रहे हैं। यह बिहार की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि दूसरे राज्यों से भागकर बिहार में छिपे इन अपराधियों की भनक राज्य की खुफिया एजेंसियों तक को नहीं लग पा रही है। खुफिया तंत्र की यह विफलता न केवल चिंताजनक है, बल्कि आम जनता की सुरक्षा पर भी भारी पड़ रही है।
बिहार में बढ़ रही आपराधिक घटनाओं के पीछे अक्सर इन्हीं बाहरी तत्वों का हाथ सामने आ रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि जब तक पुलिस को खबर लगती है, तब तक अपराधी घटना को अंजाम देकर फरार हो चुके होते हैं।
गणमान्य बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि खुफिया एजेंसी सक्रिय होती और पुलिस को इन अपराधियों के मूवमेंट की जानकारी समय रहते मिल जाती, तो बड़ी वारदातों को होने से पहले ही रोका जा सकता था। लेकिन कुछेक जगहों को छोड़ कर अधिकांश जगहों पर नहीं होता है।
कानून के जानकारों और पुलिस सुधार विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार को अब अपनी पुलिसिंग के पुराने ढर्रे को बदलना होगा। जिस तरह मुंबई, दिल्ली और अन्य राज्यों में क्राइम ब्रांच संगठित अपराध से निपटने के लिए मुख्य भूमिका निभाती है, उसी तर्ज पर बिहार में भी व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं–
1- गंभीर और संगठित अपराधों की जिम्मेदारी स्थानीय थाने से हटाकर सीधे क्राइम ब्रांच को सौंपी जानी चाहिए।
2–क्राइम ब्रांच को राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर अपराधियों के विरुद्ध स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने का निर्देश और अधिकार दिया जाए।
3–राज्य खुफिया एजेंसी के अधिकारियों को आधुनिक सर्विलांस और इंटेलिजेंस गैदरिंग का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे यूपी या अन्य राज्यों से आने वाले अपराधियों को बॉर्डर पर या छिपने के ठिकानों पर ही ट्रेस कर सकें। सरकार की इस व्यवस्था से जहां राज्य में अपराधियों पर अंकुश लगने की संभावना है। “ऐसा करने से थाना पुलिस के उपर से यह बोझ हल्का हो जाएगा। स्थानीय थाने की पुलिस को गंभीर अपराधों की जटिल जांच और दूसरे राज्यों में छापेमारी के झमेले में नहीं फंसना पड़ेगा। इससे वे अपना पूरा ध्यान अपने क्षेत्र की सामान्य कानून-व्यवस्था गश्त और आम जनता की रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाने में लगा सकेंगे, जिससे पुलिसिंग अधिक प्रभावी होगी।