न्यायालय में BNSS की धारा 183 के तहत बयान दर्ज होने के बाद नाबालिग दुष्कर्म कांड में कथा वाचक व मौनी बाबा समेत कई अन्य की बढ़ेगी मुश्किलें। न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में एक घंटे से अधिक चला बयान, जमानत की संभावना क्षीण; महिला थाना की कार्यशैली पर गंभीर सवाल
न्यायालय में BNSS की धारा 183 के तहत बयान दर्ज होने के बाद नाबालिग दुष्कर्म कांड में कथा वाचक व मौनी बाबा समेत कई अन्य की बढ़ेगी मुश्किलें। न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में एक घंटे से अधिक चला बयान, जमानत की संभावना क्षीण; महिला थाना की कार्यशैली पर गंभीर सवाल
न्यायालय में BNSS की धारा 183 के तहत बयान दर्ज होने के बाद नाबालिग दुष्कर्म कांड में कथा वाचक व मौनी बाबा समेत कई अन्य की बढ़ेगी मुश्किलें।
न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में एक घंटे से अधिक चला बयान, जमानत की संभावना क्षीण; महिला थाना की कार्यशैली पर गंभीर सवाल
दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा /संजय कुमार राय
नाबालिग से दुष्कर्म के बहुचर्चित मामले में कथावाचक, उनके गुरु बताए जा रहे ‘मौनी बाबा’ और सहयोगियों की मुश्किलें और बढ़ती दिख रही हैं। न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी शैल कुमारी की अदालत में BNSS की धारा 183 के तहत नाबालिग का बयान दर्ज किया गया। सूत्रों के अनुसार बयान अत्यंत विस्तारपूर्वक हुआ, जिसे दर्ज करने में एक घंटे से अधिक का समय लगा।
न्यायालय में दर्ज बयान के बाद मामले की दिशा और गंभीर होती प्रतीत हो रही है। विधिक जानकारों का कहना है कि नाबालिग से जुड़े इस प्रकार के गंभीर आरोपों में अदालतें अत्यंत सख्त रुख अपनाती हैं, जिससे आरोपितों के लिए जमानत की राह कठिन हो सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय न्यायालय के विवेक पर निर्भर करेगा।
सूत्रों का दावा है कि बयान में कई अहम तथ्यों का उल्लेख किया गया है, जिससे कथावाचक और ‘मौनी बाबा’ के साथ-साथ उनके कुछ शागिर्दों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। आशंका जताई जा रही है कि करीब आधा दर्जन लोग अप्राथमिकी अभियुक्त के रूप में नामजद हो सकते हैं। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो समाज में स्वयं को धर्मगुरु बताने वालों की छवि को गहरा आघात लगना तय माना जा रहा है।
मामले में पुलिसिया कार्रवाई, खासकर महिला थाना की भूमिका, भी सवालों के घेरे में है। पीड़िता नाबालिग 3 दिसंबर को महिला थाना में आवेदन लेकर पहुंची थी, लेकिन आरोप है कि आवेदन में सुधार के नाम पर उसे लौटा दिया गया। इसी बीच, कथित तौर पर दबाव और प्रलोभन के जरिए मामले को दबाने की कोशिशें होती रहीं। 19 दिसंबर को पीड़िता ने पुनः आवेदन दिया, जो मीडिया के संज्ञान में आया। लगातार खबरें सामने आने के बाद महिला थाना हरकत में आई और प्राथमिकी दर्ज की गई, जबकि नियमों के अनुसार पॉक्सो जैसे गंभीर मामले में तत्काल प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए थी।
प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी पुलिस की कार्यशैली पर संदेह बना हुआ है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज होते ही पुलिस को एक्शन मोड में आना चाहिए था। जिला स्तर के वरीय पुलिस पदाधिकारियों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है।
इस पूरे प्रकरण ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था, बल्कि महिला थाना की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि यदि महिलाओं और नाबालिगों से जुड़े मामलों में भी महिला थाना सुस्त रवैया अपनाएगी, तो उसके गठन का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
फिलहाल, न्यायालय में दर्ज बयान के बाद जांच की दिशा और तेज होने के संकेत हैं और सभी की निगाहें पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।