दरभंगा में वन-वे व्यवस्था: तुगलकी फरमान या ट्रैफिक सुधार की ठोस पहल?जाम से जूझते शहर को मिली राहत, लेकिन स्थायी समाधान के लिए प्रशासन और आमजन दोनों की जिम्मेदारी जरूरी

दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा /संजय कुमार राय 

दरभंगा शहर में सड़क जाम कोई नई समस्या नहीं है। वर्षों से आम लोग इस परेशानी को झेलते आ रहे हैं। बढ़ती आबादी, सीमित सड़कें, हर घर में दोपहिया-चारपहिया वाहन और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी—इन सबने मिलकर शहर की यातायात व्यवस्था को बदहाल बना दिया है। ऐसे में जिला प्रशासन द्वारा लागू की गई वन-वे व्यवस्था को लेकर शहर में दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

एक ओर जहां कई लोग इसे जाम से निजात दिलाने की दिशा में एक साहसिक और सराहनीय कदम बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे “तुगलकी फरमान” कहकर विरोध भी कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह विरोध पूरी तरह जायज है?

जाम की असली वजहें क्या हैं?

दरअसल, दरभंगा की सड़कें वही हैं, लेकिन वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। दफ्तर जाने का समय हो या बच्चों के स्कूल का, लोग इतनी जल्दी में होते हैं कि ट्रैफिक नियमों को दरकिनार कर देते हैं। थोड़ी सी देर में एक-दो मोटरसाइकिल खड़ी हुई नहीं कि देखते-देखते सैकड़ों वाहन सड़क पर जाम की शक्ल ले लेते हैं।

पलटी दिशा से आने वाले वाहन फंस जाते हैं और जाम छुड़ाने में पुलिस को घंटों लग जाते हैं। विडंबना यह है कि जाम लगने के बाद उंगलियां पुलिस और प्रशासन पर ही उठती हैं।

वन-वे व्यवस्था का असर दिखने लगा है

वन-वे व्यवस्था लागू हुए अभी महज चार दिन ही हुए हैं, लेकिन इसका सकारात्मक असर दिखने लगा है। जहां पहले लहेरियासराय के टावर चौक या लोहिया चौक से 5–6 किलोमीटर की दूरी तय करने में घंटों लग जाते थे, वहीं अब वही सफर मिनटों में पूरा हो रहा है।

धीमी गति से ही सही, लेकिन वाहन अब व्यवस्थित तरीके से सड़कों पर आगे बढ़ रहे हैं। स्थानीय लोगों को राहत मिल रही है और जाम की समस्या काफी हद तक खत्म होती नजर आ रही है।

अतिक्रमण और अव्यवस्था भी बड़ी बाधा

शहर में कई आरओबी का निर्माण कार्य चल रहा है, जिससे सड़कें और संकीर्ण हो गई हैं। कई जगहों पर अतिक्रमण हटाया गया है, लेकिन आज भी अनेक इलाकों में दुकानदारों, ठेला-खोमचा वालों और अस्थायी निर्माण सामग्री ने सड़कों को घेर रखा है।

दरभंगा-लहेरियासराय मार्ग पर स्थित अधिकांश दुकानों के पास पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। नतीजतन दोपहिया, तीनपहिया और चारपहिया वाहन सड़क पर ही खड़े कर दिए जाते हैं। टेम्पो स्टैंड की कमी के कारण टोटो और टेम्पो चालक भी सड़क पर ही वाहन खड़ा कर सवारी का इंतजार करते हैं, जिससे जाम की स्थिति और गंभीर हो जाती है।

ट्रैफिक सेंस की कमी सबसे बड़ी समस्या

जाम की एक बड़ी वजह ट्रैफिक सेंस की भारी कमी भी है। संकीर्ण सड़कों पर आगे निकलने की होड़ में तीन-तीन लाइनें लगा दी जाती हैं। जब रास्ता ही नहीं बचता, तो मोटरसाइकिल निकलना तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।

इतना ही नहीं, कई लोग घर बनाने का मेटेरियल बालू, गिट्टी सीधे सड़क पर ही गिरा देते हैं, जिससे सड़क और संकरी हो जाती है। ऐसे में केवल प्रशासन को दोष देना उचित नहीं कहा जा सकता।

प्रशासन के साथ आमजन की जिम्मेदारी

यह सच है कि जिला प्रशासन और जिला पुलिस को भी खुद उदाहरण पेश करना होगा। वन-वे नियमों का पालन हर हाल में होना चाहिए—चाहे वह आम नागरिक हो या सरकारी वाहन। उल्टी दिशा में प्रशासनिक वाहनों का चलना नियमों की भावना को कमजोर करता है।

लेकिन साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि शहरवासी प्रशासन का सहयोग करें। बिना जनसहयोग के कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती।वन-वे व्यवस्था कोई तुगलकी फरमान नहीं, बल्कि दरभंगा जैसे तेजी से बढ़ते शहर में ट्रैफिक सुधार की व्यावहारिक जरूरत है। यह व्यवस्था अगर सख्ती, पारदर्शिता और जनसहयोग के साथ लागू की जाए, तो दरभंगा की सड़कें एक बार फिर राहत की सांस ले सकती हैं।

अब फैसला शहरवासियों को करना है कि क्या वे जाम में फंसे रहना चाहते हैं या थोड़ी असुविधा सहकर स्थायी समाधान की ओर बढ़ना चाहते हैं।दरभंगा की बेहतरी के लिए प्रशासन और जनता दोनों को साथ चलना होगा।