कभी जनता की आवाज़ थीं ये पेटियाँ,आज जंग खाकर भूली-बिसरी,जनता की आवाज़ का रास्ता बंद,क्या खुलेंगे फिर शिकायत पेटियों के ताले?”एसएसपी से दरभंगा की जनता की उम्मीद”

दस्तक सेवन मीडिया दरभंगा /गुड्डू राज 

दरभंगा पुलिस ने कुछ साल पहले एक बेहद सराहनीय और अनोखी पहल शुरू की थी। इसका उद्देश्य था कि शहर का आम नागरिक बिना किसी परेशानी के अपनी शिकायतें,समस्याएँ,सुझाव और आवेदन सीधे पुलिस तक पहुँचा सके। इस पहल के तहत शहर के अलग-अलग चौक-चौराहों पर शिकायत पेटियाँ लगाई गई थीं।।इन पेटियों को लगाने के पीछे मुख्य सोच यह थी कि—लोगों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए थाने नहीं जाना पड़े,नागरिक अपनी बात लिखकर आसानी से पेटी में डाल सकें,पुलिस जनता की राय और शिकायतें सीधे पढ़ सके,और शहर की व्यवस्था बेहतर हो सके। उस समय कई जागरूक नागरिक इन पेटियों का उपयोग करते थे। वे समय-समय पर शिकायतें और सुझाव लिखकर डालते थे। लोगों को लगता था कि यह तरीका उन्हें पुलिस से जोड़ने का एक आसान और प्रभावी माध्यम है। समय बीतने के साथ इन शिकायत पेटियों पर ध्यान देना बंद हो गया। आज हालात यह हैं कि—कई पेटियाँ पूरी तरह जंग खा चुकी हैं,कई पेटियों के ताले वर्षों से नहीं खुले हैं,
और अधिकतर जगह इन्हें बेकार समझकर लोग उपयोग करना ही बंद कर चुके हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी भी वरीय पुलिस अधिकारी ने इस दिशा में ध्यान नहीं दिया,जिसके कारण यह पूरी व्यवस्था लगभग खत्म हो गई है। शहर घूमने पर आज भी कई जगह ये पेटियाँ टंगी दिख जाएँगी,लेकिन उनमें न तो कोई चिट्ठी जाती है और न ही इन्हें कोई खोलने आता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर इस व्यवस्था को फिर से चालू किया जाए तो पुलिस को लोगों की समस्याएँ सीधे मिलेंगी,छोटी-छोटी शिकायतों को आसानी से निपटाया जा सकता है,और पुलिस-जनता के बीच भरोसा भी मजबूत होगा।लोगों का मानना है कि यह पहल बहुत अच्छी थी,लेकिन सिर्फ ध्यान न देने की वजह से बंद पड़ गई। दरभंगा के नागरिकों को उम्मीद है कि वर्तमान वरीय पुलिस अधीक्षक इस पुरानी और उपयोगी पहल को फिर से शुरू करेंगे,जंग खाई शिकायत पेटियों की मरम्मत या बदलाव करवाएँगे,और नियमित रूप से इन पेटियों की जाँच करने की व्यवस्था बनाएँगे। अगर ऐसा होता है तो पुलिस को सीधे जनता की समस्याओं की जानकारी मिलेगी,पुलिस का काम आसान होगा,और शहर की कानून-व्यवस्था और भी मजबूत होगी। फिलहाल शहर के कई चौराहों पर ये शिकायत पेटियाँ चुपचाप लटकी हुई हैं। ताले जमे हुए हैं,रंग उखड़ चुका है और पेटियों की हालत देखकर साफ़ लगता है कि इन्हें वर्षों से छुआ भी नहीं गया।
ये पेटियाँ आज भी इसी इंतज़ार में हैं कि कब फिर से जनता की आवाज इन तक पहुँचे और कब पुलिस इन पर ध्यान दे। दरभंगा के लोग चाहते हैं कि यह व्यवस्था दोबारा चालू हो,ताकि उनकी आवाज़ बिना किसी रुकावट के पुलिस तक पहुँच सके और शहर की व्यवस्था और मजबूत बने।