बिरौल में जमीन विवाद ने लिया खतरनाक मोड़ : चिकित्सक का लाखों फंसा, दोहरी एफआईआर से मामला गरमाया , पुलिस की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल ,गोली चली तो कहाँ हें हथियार या फिर खोखा ?दों दिन बाद क्यूँ हुई प्राथमिकी दर्ज।

दस्तक 7 मीडिया /संजय कुमार राय 

बिरौल में एक चिकित्सक के साथ जमीन खरीद को लेकर हुआ विवाद अब बड़ा कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न बन गया है। जमीन खरीदने गए डॉक्टर को यह अंदाज़ा भी नहीं था कि दलालों, भूमाफियाओं और थाने की कार्यशैली के बीच फंसकर उनका मामला इतना उलझ जाएगा। चिकित्सक का लाखों रुपये का अग्रिम भुगतान फंस गया और न्याय की गुहार लगाने के बाद उल्टे उन्हीं पर गंभीर आरोपों की दूसरी प्राथमिकी दर्ज कर दी गई। पूरे इलाके में इस मामले को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवालों का तूफान खड़ा हो गया है।

जमीन खरीदने पहुंचे डॉक्टर के साथ धोखा, न रजिस्ट्री हुई, न पैसे लौटे

मामला बिरौल थाना अंतर्गत साहो गांव का है। जानकारी के अनुसार, एक चिकित्सक ने निजी उपयोग के लिए जमीन खरीदने हेतु विक्रेता को लाखों रुपये अग्रिम दे दिए। भरोसे और शराफत में पैसे सौंपने के बाद डॉक्टर को उम्मीद थी कि जल्द ही जमीन की रजिस्ट्री हो जाएगी, लेकिन जमीन विक्रेता ने रजिस्ट्री तो नहीं की, उल्टा डॉक्टर के दिए पैसे भी वापस नहीं किए।

जब डॉक्टर ने कई बार आग्रह किया और पैसे लौटाने या रजिस्ट्री करने की मांग की, तो विक्रेता टालमटोल करता रहा। अंततः धोखे से क्षुब्ध होकर डॉक्टर ने बिरौल थाना में जमीन विक्रेता के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की प्राथमिकी दर्ज करा दी।

एफआईआर के बाद पलटा खेल, भूमाफिया ने दलालों के साथ मिलकर किया पलटवार

जैसे ही डॉक्टर की तरफ से प्राथमिकी दर्ज हुई, मामला वहीं से पलट गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, जमीन माफिया और थाना दलाल सक्रिय हो गए। आरोप है कि जमीन विक्रेता एवं उसके सहयोगियों ने एक “दबंग व्यक्ति” के माध्यम से डॉक्टर पर ही गंभीर आरोप लगाते हुए उल्टी एफआईआर दर्ज करा दी।अचरज की बात यह है कि डॉक्टर के विरुद्ध यह आवेदन 11 नवंबर 2025 को बिरौल थाना में दिया गया था।आवेदक की ओर से आरोप लगाया गया कि डॉक्टर और उनके साथियों ने कथित तौर पर गोली चलाई और वे बाल-बाल बच गए!

सबसे बड़ा सवाल : अगर गोली चली, तो पुलिस ने तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की?

लोगों का कहना है कि यदि घटना इतनी गंभीर थी और गोली चली थी, तो पुलिस को उसी समय सूचना मिलनी चाहिए थी ,थानाध्यक्ष को तुरंत प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए थी, घटनास्थल पर जाकर खोखा, देसी कट्टा/हथियार, या अन्य साक्ष्य बरामद करने चाहिए थे लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

इसके बजाय दो दिन बाद, यानी 13 नवंबर 2025 को डॉक्टर समेत कई लोगों पर एफआईआर संख्या 471/25 दर्ज कर दी गई।

स्थानीय सूत्रों का दावा है कि पुलिस ने बिना सत्यापन, बिना साक्ष्य संग्रह और बिना किसी तफ्तीश के एफआईआर दर्ज की। इससे प्रश्न उठ रहा है कि आखिर दो दिनों तक पुलिस क्या कर रही थी?

क्या पुलिस पर दबंगों का दबाव?

सूत्रों का कहना है कि इस पूरी कार्रवाई के पीछे एक स्थानीय दबंग और दलालों का दबाव काम कर रहा है। आरोप यह भी है कि डॉक्टर से लिए गए लाखों रुपये को हड़पने की नीयत से जमीन विक्रेता और उसके साथी थाने में मोटी रकम देकर डॉक्टर पर झूठी प्राथमिकी दर्ज कराने में सफल हो गए।

स्थानीय जानकारों का कहना है कि “यदि गोली चलने जैसी गंभीर घटना होती, तो बिरौल थाना पुलिस दो दिन इंतजार नहीं करती। यह पूरा मामला ‘सेटिंग’ और दलालों के इशारे पर दर्ज किया गया लगता है।”

क्या सचमुच न्याय मांगना ‘गुनाह’ बन रहा है?

पूरे बिरौल में चर्चा है कि डॉक्टर को न्याय मांगने पर ही सजा दी गई!असली धोखेबाजों की जगह पीड़ित चिकित्सक को ही आरोपी बना दिया गया!पुलिस की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं

लोग पूछ रहे हैं कि “जब जाति, हैसियत और पैसे वाले लोग थाने को प्रभावित कर लें, तो आम आदमी या शरीफ लोग न्याय के लिए कहाँ जाएंगे?”

एसएसपी के प्रयासों के बावजूद थाना स्तर पर रवैया जस का तस!

पिछले कुछ महीनों में दरभंगा के एसएसपी लगातार पारदर्शी और निष्पक्ष पुलिसिंग के लिए प्रयासरत हैं। कई कार्रवाईयों से लोगों में उम्मीद भी जगी थी।लेकिन बिरौल थाना की इस कार्रवाई ने उस भरोसे पर पानी फेर दिया है।

स्थानीय लोग कह रहे हैं कि“एसएसपी ईमानदार हैं, लेकिन थानेदारों की कार्यशैली नहीं बदल रही। बिरौल की यह कार्रवाई उसी का उदाहरण है”।

फ़िलहाल, बिरौल के इस बहुचर्चित प्रकरण ने प्रशासन, पुलिस, न्याय और जमीन माफिया के गठजोड़ की एक चिंताजनक तस्वीर खड़ी कर दी है।