थानेदार ने प्राइवेट ड्राइवरों को थमा दी सरकारी चाभी,हकीकत सबके सामने”सरकारी गाड़ी और प्राइवेट ड्राइवर का खेल, सवाल: पैसे कौन देता है? थानेदार,सरकारी खजाना या कोई तीसरा व्यक्ति?
थानेदार ने प्राइवेट ड्राइवरों को थमा दी सरकारी चाभी,हकीकत सबके सामने”सरकारी गाड़ी और प्राइवेट ड्राइवर का खेल, सवाल: पैसे कौन देता है? थानेदार,सरकारी खजाना या कोई तीसरा व्यक्ति?
दस्तक 7 मीडिया दरभंगा /गुड्डू राज
सच्चाई छुप नहीं सकती,बनावट के उसूलों से,खुशबू आ नहीं सकती कभी,कागज के फूलों से…”किशोर कुमार के इस गीत की पंक्ति दरभंगा जिले में ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में चल रही पुलिस व्यवस्था की हकीकत पर बिल्कुल सही बैठती है। दस्तक 7 मीडिया ने इस मामले को बारीकी से उजागर किया है। थानेदारों की चांदी और प्राइवेट ड्राइवरों का खेल,दरभंगा जिले में इन दिनों थानेदारों की खूब चांदी कट रही है। वजह है सरकारी गाड़ियों पर प्राइवेट ड्राइवरों की तैनाती। नियम के अनुसार,थाने में तैनात पुलिस अधिकारियों के लिए सरकारी ड्राइवर की व्यवस्था होना जरूरी है। लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है। कई थानों में पुलिस अधिकारी अपनी मर्जी से निजी ड्राइवर रखते हैं और उन्हें सरकारी गाड़ी चलाने की अनुमति दे देते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर एक निजी व्यक्ति थाना की गाड़ी क्यों चला रहा है? उसका क्या मकसद है? वह किस उद्देश्य से थाने की कार्रवाई के साथ शामिल हो रहा है? यह भी चिंता उठ रही है कि जब प्राइवेट ड्राइवर पुलिस की गाड़ी चलाता है,तो उसे पुलिस टीम की गतिविधियों,गंतव्य और ऑपरेशन की जानकारी मिल जाती है। बिना वेरिफिकेशन के किसी व्यक्ति को ऐसी जानकारी तक पहुंच देना बड़ा खतरा माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि प्राइवेट ड्राइवरों को सरकारी गाड़ी चलाने देने से थाने की छवि खराब हो रही है। भ्रष्टाचार और मनमानी का बढ़ावा: सबसे बड़ा सवाल—पैसे कौन देता है? अगर ड्राइवर सरकारी नहीं है,तो उसे भुगतान कौन कर रहा है? थानेदार अपनी जेब से दे रहे हैं—तो क्यों? किस मजबूरी में?सरकारी खजाने से पैसा जा रहा है—तो यह नियम विपरीत है,क्योंकि सरकारी भुगतान सिर्फ अधिकृत ड्राइवर को मिलता है। कोई तीसरा व्यक्ति खर्च दे रहा है—अगर ऐसा है,तो मामला और भी गंभीर है,निजी ड्राइवर रखने से कुछ थानेदारों को सुविधा मिलती है। वे अपनी मर्जी का आदमी रखते हैं,जो दिन-रात उनकी निजी और सरकारी दोनों ड्यूटी निभाता है। कई बार यह ड्राइवर थाने के काम भी निपटाता है। कई बार अधिकारी के निजी काम भी कर देता है। इसका असर सीधे पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर पड़ता है।जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया,जब थाने में सरकारी गाड़ियों का सही इस्तेमाल ही नहीं होगा,तो कानून-व्यवस्था कैसे बेहतर चलेगी? इस मामले की पूरी जांच हो और जिस थाने में निजी ड्राइवर सरकारी गाड़ी चला रहे हैं,कार्रवाई की जाए,भूमिका सामने आ जायेगी,अब तक प्रशासनिक स्तर पर इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन उम्मीद है कि जल्दी ही सख्त कदम उठाए जाएँगे,ताकि: सरकारी संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित हो। पुलिस व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना रहे।दरअसल,यह मामला सिर्फ एक थाने की गलती नहीं है,बल्कि पूरे जिले की सुरक्षा और प्रशासनिक नियमों की अनदेखी को उजागर करता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई,तो इसका प्रभाव कानून-व्यवस्था,पुलिस की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे पर गंभीर रूप से पड़ेगा।
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