वरीय अधिकारी कब करेंगे कार्रवाई? थानेदार नियम तोड़कर प्राइवेट ड्राइवर से सरकारी गाड़ी चलवा रहे,सवाल—पैसे कौन देता है?थानेदार,सरकारी खजाना या कोई तीसरा आदमी?”
वरीय अधिकारी कब करेंगे कार्रवाई? थानेदार नियम तोड़कर प्राइवेट ड्राइवर से सरकारी गाड़ी चलवा रहे,सवाल—पैसे कौन देता है?थानेदार,सरकारी खजाना या कोई तीसरा आदमी?”
दस्तक 7 मीडिया दरभंगा /गुड्डू राज
जिले में पुलिस विभाग के नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। कई थानों में सरकारी नियमों को नजरअंदाज करते हुए थानेदार प्राइवेट ड्राइवरों से सरकारी गाड़ी चलवा रहे हैं। सवाल यह है कि वरीय पुलिस पदाधिकारी इस पर कार्रवाई कब करेंगे,या फिर इसी तरह नियमों को ताख पर रखकर सरकारी गाड़ियाँ निजी हाथों में चलती रहेंगी?
इसके साथ ही लोगों के मन में एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है—आखिर प्राइवेट ड्राइवर को पैसे कौन देता है? क्या थानेदार अपनी जेब से देते हैं?क्या सरकारी खजाने से भुगतान होता है?या कोई और स्रोत है,जिसकी जांच जरूरी है?नियम साफ—सरकारी गाड़ी सिर्फ अधिकृत ड्राइवर चलाएगा,पुलिस विभाग के नियमों में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि—सरकारी गाड़ी केवल नियुक्त सरकारी ड्राइवर ही चलाएगा,उसका चरित्र सत्यापन होना जरूरी है,उसे सुरक्षा नियमों,गोपनीयता और पुलिस प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए,लेकिन दरभंगा में स्थिति बिल्कुल उलटी है।कई थाने बिना अनुमति के निजी ड्राइवरों से गाड़ी चलवा रहे हैं। निजी ड्राइवर से सरकारी गाड़ी चलवाने से बढ़ता है खतरा,इस तरह की लापरवाही से कई तरह के जोखिम पैदा होते हैं: ड्राइवर को पुलिस की कार्रवाई,गंतव्य और छापेमारी की जानकारी पहले ही मिल जाती है।संवेदनशील जानकारी बाहर लीक होने का खतरा बढ़ जाता है गलत गतिविधियों में शामिल लोग ड्राइवरों से दोस्ती कर लेते हैं,कई बार कार्रवाई शुरू होने से पहले ही सूचना बाहर चली जाती है,अपराधियों को पुलिस की योजना का अंदाजा पहले ही लग जाता है,इसी वजह से समाज में चर्चा फैल रही है—”भैया भेल ड्राइवर अब डर किस बात का,ड्राइवर ही सब पहले जान लेता है!”सबसे बड़ा सवाल—पैसे कौन देता है? अगर ड्राइवर सरकारी नहीं है,तो उसे भुगतान कौन कर रहा है? थानेदार अपनी जेब से दे रहे हैं—तो क्यों? किस मजबूरी में?सरकारी खजाने से पैसा जा रहा है—तो यह नियम विपरीत है,क्योंकि सरकारी भुगतान सिर्फ अधिकृत ड्राइवर को मिलता है। कोई तीसरा व्यक्ति खर्च दे रहा है—अगर ऐसा है,तो मामला और भी गंभीर है,क्योंकि इससे गाड़ी पर बाहरी नियंत्रण का खतरा बनता है। अगर इसकी जांच की जाए,तो कई राज खुल सकते हैं। ज्ञात है कि स्थानीय प्राइवेट ड्राइवर इतने सक्रिय हैं कि थाने तक सूचना पहुँचने से पहले ही कई बातें ड्राइवरों तक पहुँच जाती हैं। इससे—थाने की छवि खराब होती है,पुलिस की गोपनीयता समाप्त होती है,कार्रवाई पर असर पड़ता है,अपराधियों के लिए बच निकलना आसान हो जाता है,नियम के खिलाफ है यह व्यवस्था,पुलिस विभाग में एक और महत्वपूर्ण नियम है: किसी पुलिसकर्मी को उसके अपने क्षेत्र में ड्यूटी नहीं दी जाती,ताकि वह स्थानीय दबाव में न आए। लेकिन यहाँ उल्टा हो रहा है—थानों में स्थानीय ड्राइवरों को सीधे सरकारी चाभी दी जा रही है। यह मुद्दा गंभीर है और वरीय पुलिस पदाधिकारी को तुरंत इसकी जांच करनी चाहिए। जांच से यह सामने आ सकता है—किन थानों में प्राइवेट ड्राइवर गाड़ियाँ चला रहे हैं,कौन भुगतान कर रहा है,कौन-कौन संवेदनशील जानकारी बाहर जाती रही
किन लोगों का ड्राइवरों से सीधा संपर्क था,दरभंगा में थानों द्वारा सरकारी गाड़ियाँ निजी ड्राइवरों से चलवाना सिर्फ एक छोटी गलती नहीं,बल्कि पूरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा है।अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई,तो इसका गंभीर प्रभाव पूरे जिले की कानून व्यवस्था पर पड़ेगा। अब बड़ा सवाल यह है—वरीय पुलिस पदाधिकारी कब कार्रवाई करेंगे?और पैसे देने वाला कौन है—इसकी सच्चाई कब सामने आएगी?