लोकतंत्र का सवाल,मतदान बहिष्कार-विरोध का अधिकार या कर्तव्य से पलायन? भारत के लोकतंत्र में असंतोष व्यक्त करने का एक संवैधानिक तरीका नोटा मौजूद है।
लोकतंत्र का सवाल,मतदान बहिष्कार-विरोध का अधिकार या कर्तव्य से पलायन? भारत के लोकतंत्र में असंतोष व्यक्त करने का एक संवैधानिक तरीका नोटा मौजूद है।
लोकतंत्र का सवाल,मतदान बहिष्कार-विरोध का अधिकार या कर्तव्य से पलायन?
भारत के लोकतंत्र में असंतोष व्यक्त करने का एक संवैधानिक तरीका नोटा मौजूद है।
दस्तक7मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में, मतदान को न केवल एक अधिकार माना जाता है, बल्कि एक नागरिक कर्तव्य भी। लेकिन जब मतदाता अपने नेताओं या चुनावी प्रक्रिया से असंतुष्ट होते हैं, तो विरोध के रूप में अक्सर मतदान बहिष्कार का सहारा लेते हैं।
यह कदम कितना उचित है या फिर कितना अनुचित , इस पर दस्तक7मिडिया ने दर्जनों राजनीतिक बुद्धि जीवियों से बात की तो लोगों ने अपने – अपने विचार जो व्यक्त किए,वह समझा जा सकता हे ?
मतदान का बहिष्कार करने वाले समूह और नागरिक इसे अपनी आवाज उठाने का एक शक्तिशाली लोकतांत्रिक तरीका मानते हैं।
जब किसी क्षेत्र के लोग सड़क, पानी, स्वास्थ्य या अन्य मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी से पीड़ित होते हैं, तो वे बहिष्कार को प्रशासन और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का अंतिम उपाय मानते हैं। यह एक सांकेतिक विरोध है कि “जब तक हमारी समस्या हल नहीं होगी, हम इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे।”
कई बार मतदाता यह महसूस करते हैं कि चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवार अयोग्य हैं या भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। ऐसी स्थिति में, बहिष्कार यह दर्शाता है कि मतदाता को कोई भी विकल्प स्वीकार्य नहीं है।
एक सफल और बड़े पैमाने पर किया गया बहिष्कार चुनाव आयोग और संबंधित प्रशासनिक मशीनरी पर तत्काल ध्यान देने और समस्याओं को हल करने का दबाव डालता है, क्योंकि कम मतदान प्रतिशत उनकी विफलता को दर्शाता है।
अधिकांश राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बहिष्कार का फैसला लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है। मतदान का अधिकार लंबे संघर्षों के बाद मिला है। इसे इस्तेमाल न करना वास्तव में अपने ही अधिकारों और कर्तव्यों का परित्याग है। बहिष्कार करने से न केवल अपनी समस्या को हल करने का मौका गंवा दिया जाता है, बल्कि लोकतंत्र की नींव भी कमजोर होती है।
यदि एक बड़ी आबादी बहिष्कार करती है, तो मतदान करने वाली छोटी आबादी ही प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। इससे यह जोखिम बढ़ जाता है कि कोई अयोग्य या जनता के हितों के विपरीत काम करने वाला व्यक्ति कम वोटों के आधार पर सत्ता में आ जाए। बहिष्कार करने वाले लोगों को बाद में उसी सरकार के निर्णयों को स्वीकार करना पड़ता है, जिसे चुनने में उन्होंने भाग नहीं लिया।
भारत के लोकतंत्र में असंतोष व्यक्त करने का एक संवैधानिक तरीका मौजूद है- (नोटा)।
मतदाता किसी भी उम्मीदवार को पसंद न करने पर नोटा का बटन दबा सकते हैं। जानकारों का मानना है कि बहिष्कार के बजाय नोटा का प्रयोग करना चाहिए। नोटा मतों की गणना तो होती है, जो असंतोष को एक आधिकारिक सांख्यिकीय रूप देता है, जबकि बहिष्कार का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होता।
लोकतंत्र का सार भागीदारी में है। हालांकि नागरिकों को विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन मतदान बहिष्कार को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए। “लोकतंत्र में अपनी बात रखने का सबसे प्रभावी तरीका मतदान है, न कि मतदान से दूर रहना। यदि प्रत्याशी पसंद नहीं हैं, तो नोटा का उपयोग करें, पर अपने मताधिकार की शक्ति को व्यर्थ न जाने दें।”
सच्चा लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब हर नागरिक अपनी समस्याओं के लिए सड़कों पर उतरने के साथ-साथ, बूथ तक जाकर अपनी आवाज दर्ज कराएगा। बहिष्कार क्षण भर का विरोध हो सकता है, लेकिन मतदान आने वाले पांच सालों के लिए एक बदलाव लाने की शक्ति रखता है।