गौड़ा बौराम विधानसभा, महागठबंधन में ‘दो’ उम्मीदवार, असमंजस से VIP और आरजेडी उम्मीदवार की राजनीति पर सवाल

दस्तक7मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा

दरभंगा जिला अंतर्गत गौड़ा बौराम विधानसभा सीट पर महागठबंधन का आंतरिक विवाद आज भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है, जिसने चुनावी माहौल को गरमा दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के बीच सीट बंटवारे की खींचतान के कारण महागठबंधन के दो उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे गठबंधन के सामने असहज स्थिति पैदा हो गई है।
पिछले दिनों कोठराम की चुनावी सभा को संबोधित करते हुए आरजेडी नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने वीआईपी उम्मीदवार संतोष सहनी को ही महागठबंधन का आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किया और उन्हें माला पहनाकर समर्थन दिया।
तेजस्वी यादव ने इसी मंच से आरजेडी के चुनाव चिह्न ‘लालटेन’ पर नामांकन दाखिल करने वाले अफजल अली खान को ‘सम्मान’ देने की बात भी कही।
हालांकि, तेजस्वी यादव ने अफजल अली खान को आवंटित आरजेडी के चुनाव चिह्न (लालटेन) को वापस लेने या लौटाने पर कोई स्पष्ट चर्चा नहीं की।
इस असमंजस के बावजूद, गौड़ा बौराम विधानसभा क्षेत्र में एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अफजल अली खान को ही महागठबंधन का सच्चा उम्मीदवार मान रहा है, क्योंकि उनके पास आरजेडी का आधिकारिक सिंबल है।
सीट बंटवारे के तहत, गौड़ा बौराम सीट वीआईपी के खाते में गई थी, जिसके बाद वीआईपी ने मुकेश सहनी के भाई संतोष सहनी को उम्मीदवार बनाया। और अफजल अली खान से नामांकन वापस लेने को कहा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। वीआईपी ने दवा किया था कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने भी चुनाव आयोग को पत्र लिखकर यह स्पष्ट किया कि यह सीट वीआईपी के खाते में गई है और अफजल अली खान का नामांकन गठबंधन की सहमति के बिना हुआ है, लेकिन चुनाव आयोग ने फिलहाल इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है।
महागठबंधन के दो उम्मीदवारों के आमने-सामने होने से वोटों के बंटवारे का खतरा बढ़ गया है, जिसका सीधा फायदा एनडीए के उम्मीदवार को मिलने की संभावना जताई जा रही है।
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में VIP की राजनीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पहला सवाल: यदि संतोष सहनी महागठबंधन के ‘आधिकारिक’ उम्मीदवार होते हुए भी चुनाव हार जाते हैं, तो क्या यह वीआईपी और उनके सुप्रीमो मुकेश सहनी के राजनीतिक प्रभाव को एक बड़ा झटका देगा?
दूसरा सवाल: आरजेडी सिंबल पर लड़ रहे उम्मीदवार के खिलाफ खुद आरजेडी और तेजस्वी यादव को प्रचार करना पड़ रहा है। क्या यह स्थिति भविष्य में महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे के फॉर्मूले और सहयोगी दलों के प्रति विश्वास को कमजोर नहीं करेगी?
तीसरा सवाल: एम-वाई समीकरण के एक बड़े हिस्से का अफजल अली खान के पक्ष में बने रहना, आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक पर नियंत्रण की कमजोरी को दर्शाता है, जिसका असर न केवल वीआईपी बल्कि आरजेडी के भविष्य के गठबंधन समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
दुसरी ओर मुकेश सहनी जहां अफजल अली खान को दल से निष्कासित करवाने का दावा कर रहे हैं वहीं अफजल अली खान अपने समर्थकों के साथ चुनाव मैदान में डटे रहने का चुनौती दे रहे हैं।
फिलहाल, गौड़ा बौराम का चुनावी संग्राम केवल दो उम्मीदवारों के बीच का नहीं, बल्कि महागठबंधन के आंतरिक समन्वय और वीआईपी के राजनीतिक भविष्य को तय करने वाला एक महत्वपूर्ण मुकाबला बन गया है।