दो मासूम बच्चों की हत्या के जुर्म में पिता को आजीवन सश्रम कारावास, पत्नी को करंट से मारने का किया था प्रयास

दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा/विधि संवाददाता,

सिविल कोर्ट दरभंगा के अपर सत्र न्यायाधीश आदिदेव की कोर्ट ने दो मासूम बच्चों की निर्मम हत्या करने की जूर्म में सोनकी थानाक्षेत्र के बासुदेवपुर निवासी उपेन्दर यादव के पुत्र दीपनारायण यादव को आजीवन सश्रम कारावास , और 25 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है।अर्थदंड नही चूकाने पर एकल सजायाफ्ता यादव को ढाई माह अतिरिक्त सजा भुगतना पड़ेगा।अभियोजन पक्ष का संचालन कर रहे एपीपी अशोक कुमार भगत ने बताया कि सदर थानाक्षेत्र के बासुदेवपुर गांव में 4 मई 20 की अहले सुबह जूर्मी ने अपने 4 वर्षीय पुत्री काजल और दो वर्षीय पुत्र शिवम की निर्मम हत्या कर दिया।इतना हीं नहीं अपने मासूम बच्चों को बचाने गई मां कंचन देवी को बदसुरत कहकर उसे भी बिजली का करंट लगाकर मारने का प्रयास किया।इस लोमहर्षक बारदात की प्राथमिकी हत्यारे की पत्नी कंचन कुमारी ने अपने पति दीपनारायण यादव और ससूर उपेंद्र यादव के बिरुद्ध प्रताड़ित करने तथा पुत्री काजल कुमारी और पुत्र शिवम की हत्या कर देने को लेकर सोनकी ओपी (सदर थाना ) कांड सं. 199/20 दर्ज कराई थी।अनुसंधान पश्चात आईओ ने सूचिका के पति के विरुद्ध भादवि की धारा 302 और धारा 498(A) में आरोप पत्र समर्पित किया।कोर्ट में इस केश का बिचारण सत्रवाद सं.105/20 के तहत प्रारंभ हुआ।पीपी अमरेंद्र नारायण ने बताया कि अभियोजन पक्ष से एपीपी अशोक कुमार भगत और बबीता कुमारी ने नौ गवाहों की गवाही कराई।गत 9 अक्टूबर को कोर्ट ने इस हत्याकांड मामले का ट्रायल पुरा कर दोनो बच्चों की हत्या के लिए अलग-अलग, 302 भादवि तथा 498(A) में हत्यारे पिता को जूर्मी घोषित किया।गुरुवार को कोर्ट ने जूर्मी अभियुक्त का सजा निर्धारण के बिन्दु पर अभियोजन और बचाव पक्ष का वहश सुनने तथा अभिलेख पर मौजूद साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद काजल की हत्या की जूर्म में आजीवन सश्रम कारावास, तथा 10 हजार रुपये अर्थदंड,वहीं शिवम की हत्या के लिए भी आजीवन सश्रम कारावास और 10 हजार ,तथा पत्नी कंचन देवी को बदसुरत कहकर प्रताड़ित करने की जूर्म में दो वर्षों का कठोर कारावास और 5 हजार रुपये अर्थदंड चूकाने की सजा सुनाई है।लोक अभियोजक अमरेंद्र नारायण झा ने कहा कि अभियोजन पक्ष से सभी एपीपी पूरी निष्ठा से साक्ष्य रख रहे हैं। जिससे कोर्ट के पीठासीन अधिकारी को न्याय निर्णय में दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ रहा है।