कदवा प्रखंड के सोनैली-पूर्णिया मुख्य पथ पर शिवगंज के समीप महानंदा नदी का टूटा तटबंध बीते कई वर्षों से इस पूरे इलाके के लिए प्रलयकारी बाढ़ का मुहाना साबित हो रहा है। इन सबके बीच, टूटे तटबंध के ठीक सामने लगभग पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित प्रसिद्ध शिवगंज काली मंदिर हर बार प्रलयकारी बाढ़ पर भारी पड़ते हुए, क्षेत्र में आस्था का अलख जगा रही है। यह मंदिर कई दशकों से पूजा-पाठ का केंद्र रहा है।

 

तटबंध के टूटने और बनने का सिलसिला यहीं आस-पास वर्षों से चला आ रहा है। पहली बार 1987 में तटबंध टूटने के बाद मची भीषण तबाही को कदवा समेत पूरे जिलावासियों ने देखा था। 2017 की बाढ़ में मंदिर का बचा रहना किसी चमत्कार से कम नहीं तटबंध के बनने और टूटने का सिलसिला जारी रहा, लेकिन 2017 की बाढ़ में जो हुआ, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। काली मंदिर के ठीक सामने पांच सौ मीटर की दूरी पर दो जगह महानंदा तटबंध टूट गया था।

 

इससे निकलने वाली प्रलयंकारी बाढ़ के पानी के तेज रफ्तार वेग और दबाव में भी, काली मंदिर का बचा रहना कौतूहल का विषय बन गया। बाढ़ के वेग में मंदिर से सटे स्क्रू पाईल्स पुल के साथ कई मीटर सड़क का तो अता-पता तक नहीं चला और उस वर्ष पूरे कदवा प्रखंड के अलावा डंडखोरा, हसनगंज, कटिहार और प्राणपुर जैसे अन्य प्रखंडों में भी भीषण तबाही मची थी। पानी कम होने के बाद जब नाव से परिचालन शुरू हुआ, तो लोगों ने देखा कि मंदिर के सटे एक बड़ा कुंड बन गया था।

 

चारों तरफ तबाही का मंजर था, लेकिन प्रलय के मुहाने पर खड़ा यह काली मंदिर लोगों के लिए आश्चर्य और अटूट आस्था का केंद्र बन गया। समय के साथ, लोगों की यहां पूजा-पाठ एवं मन्नत मांगने के लिए भारी भीड़ जुटने लगी। बाद में, वहां उच्च स्तरीय पुल का निर्माण कराया गया, जिसकी वजह से मंदिर पुल के नीचे आ गया था। इसके बाद, स्थानीय लोगों के सहयोग से उसी मंदिर के ऊपर छत की ढलाई कर पुल के बराबरी का मंदिर बना दिया गया।