मोहनपुर ओपी अध्यक्ष की हत्या में अबतक अपराधियो का नहीं मिला सुराग ?पुलिस के कार्यशैली में भी हैं कई दाग ,आखिर कब तक चलता रहेगा खूनी खेल ?
मोहनपुर ओपी अध्यक्ष की हत्या में अबतक अपराधियो का नहीं मिला सुराग ?पुलिस के कार्यशैली में भी हैं कई दाग ,आखिर कब तक चलता रहेगा खूनी खेल ?
मोहनपुर ओपी अध्यक्ष की हत्या में अबतक अपराधियो का नहीं मिला सुराग ,पुलिस के कार्यशैली में भी हैं कई दाग ,आखिर कब तक चलता रहेगा खूनी खेल ?
संजय कुमार राय की कलम से ———
समस्तीपुर जिले में 14अगस्त को हुई मोहनपुर ओपी थानाध्यक्ष पुअनि स्व नन्द किशोर यादव की हुई हत्या ने
पुलिस और सरकार पर प्रश्न खड़ा कर दिया हैं। जिस राज्य में पुलिस ही सुरक्षित नहीं हैं वहां आम लोंगों की सुरक्षा की बात करना बेईमानी हैं।मोहनपुर ओपी अध्यक्ष को अपराधियों ने ऐसे गोली मारी और फरार हुआ जैसे कुछ हुआ ही नहीं। सरकार और प्रशासन सांत्वना देने के बाद बस इस हत्या को चर्चा में जिंदा रखें हुये हैं,लेकिन यह चर्चा भी कुछ दिनों तक हैं लोग भूल जाएंगे । तीन दिन बीत गये हैं अबतक अपराधियों का सुराग नहीं मिला है।देखा जाय तो यह घटना पूरे बिहार के पुलिस के लिये चुनौती हैं। लेकिन इस चुनौती को पुलिस कब पूरा करेगी यह सवाल हैं ?अगर पुलिसिया व्यवस्था का यही हाल रहा तो आने वाले वक्त में राज्य में कहीं ना कहीं फिर यही घटना दुहरायेगा जो ओपी अध्यक्ष का हुआ हैं।
गिरती हुई पुलिस की कार्यशैली ही इसका जिम्मेदार भी हैं। बड़े ओहदे पर बैठे अधिकारी सिर्फ मूकदर्शक होते हैं।
कई जिले के एसपी सरकारी फोन नहीं उठाते हैं अपना नंबर भी बंद कर रखते हैं। कांडों के पर्यवेक्षण में घटना स्थल पर नहीं जाते।राज्य में पदस्थापित डीएसपी स्तर के पदाधिकारी दुकान खोलकर बैठे हैं। डीएसपी के प्रतिवेदन को आधार मानकर अधिकतर प्रतिवेदन को
एसपी रेंक के अधिकारी सत्य मानकर प्रतिवेदन निकाल देते हैं। इस बीच बड़े पैसों का खेल होता हैं।ये अधिकारी पीड़ित पक्ष को यह कहकर विदा कर देते हैं कि न्यायालय का दरवाजा खटखटाइये ?पर्यवेक्षण के खेल में ज्यादातर जिलों में हत्या जैसे मामले में फंसे अपराधियों को पर्यवेक्षण रिपोर्ट में मदद मिल जाता हैं। डीएसपी और एसएसपी के दिये गये निर्देश के आलोक में अनुसंधानक भी अपना डायरी और चार्जशीट न्यायालय में जमा कर देता हैं इस कारण अपराधियों को जमानत मिल जाती हैं। और यही कारण हैं कि अपराधियों का मनोबल काफी बढ़ जाता हैं और वह गोली चलाने से नहीं डरता हैं। बिहार में पुलिस पहले भी थी। अपराध भी चरम पर था।पुलिस की कारवाई भी जबरदस्त थी। कुख्यात अपराधियों को भी पुलिस से डर था। एसएसपी भी घटनास्थल पर जाते थे। कांडों के पर्यवेक्षण में भी एसपी का दस्तक गांवों तक होता था। कई लोंगों से बातचीत होती थी। नेटवर्क तैयार होता था। इसका प्रतिफल यह होता था कि एसपी को हर कांडों में पूरी जानकारी रहती थी। सत्य को असत्य और असत्य को सत्य करने में देर नहीं लगती थी। अब तो एक थानाध्यक्ष का नेटवर्क मजबूत नहीं रहता। इन्हीं पदाधिकारियो के नक्शे कदम पर थानाध्यक्ष /ओपी अध्यक्ष भी चलते हैं। इसका प्रतिकूल प्रभाव पुलिस विभाग पर ही पड़ रहा हैं। अगर मोहनपुर ओपी अध्यक्ष का आज नेटवर्क मजबूत रहता तो एक तरफ जहां भेंस की तस्करी को लेकर जिसने भी सूचना दी हो उन्हें दूसरी तरफ से फोन आ जाता कि सर ये सभी अपराधी हैं आप सजग होकर आये और कारवाई करें।
नेटवर्क से ही पुलिस की बेहतर पुलिसिंग की कल्पना की जा सकती हैं जिसका घोर अभाव हैं। इसे दुरुस्त करने की जरूरत हैं।
बिहार में समय समय पर ऐसे भी पुलिस महानिदेशक पद पर आसीन हुये हैं जो पुलिस विभाग पर ही अनुसंधान करने की चेष्टा किये हैं। एक पुलिस महानिदेशक का यह आदेश कि गोली चलाने के बजाय लाठी ,डंटा चलाइये , फोटो खिचिये और कारवाई कीजिये। कई लोग कहते हैं कि यही आदेश पुलिस विभाग को पंगु बना दिया। अब अपराधी गोली चलाये और पुलिस वाले फोटो खींचने के लिये तैयार रहें तो परिणाम क्या होगा ,आप समझ सकते हैं।सेंकड़ों लोग कहते हैं कि पुलिस की वर्दी को देखने से डर होना जरूरी हैं जो डर समाप्त हो गया हैं। फ्रेंडली होना जरूरी हैं पर पर अपराधियों के साथ नहीं ,सामाजिक लोंगों के साथ जरूरी हैं और यही आपका बेहतर नेटवर्क बनाएगा ।
डयूटी के दौरान पुअनि नन्द किशोर की मौत के बाद अबतक कोई भी राजनेता उनके परिजनों को सुधि लेने नहीं आये हैं यही नहीं पुलिस विभाग के अधिकारियों पर भी बहूत फर्क नहीं पड़ा हैं।यही कारण भी हैं कि अपराधियों का सुराग अबतक पुलिस को नहीं मिला हैं।
पुलिस महानिदेशक आर एस भट्टी के पुलिस महानिदेशक बनने पर लोंगों में एक विश्वास जगा कि अब बेहतर पुलिसिंग होगी।उनके द्वारा दिया गया दो भाषण आम लोंगों का दिल जीत लिया अब वहीं आम लोग कह रहें हैं कि पुलिस महानिदेशक श्री भट्टी ऐसे कैसे हो गये।आम जनता को पुलिस से सबसे ज्यादा उम्मीद रहती हैं लेकिन इस उम्मीद पर पानी फिर गया हैं।अब पुलिस ही सुरक्षित नहीं हैं।
अब पुलिस को सूचना देने वाले ही पुलिस के कोपभाजन का शिकार हो जाते हैं।अगर कोई पुलिस पदाधिकारी पर उनके कार्यशैली को लेकर आरटीआई के तहत कोई सूचना मांगता हैं और बार बार मांगता हैं तो उसी पर कारवाई हो जाती हैं ,झूठा प्राथमिकी दर्ज करा दी जाती हैं।कोई पत्रकार पुलिस के गलत कार्यशैली को उजागर करता हैं तो उसपर दबाव बनाने के लिये प्राथमिकी दर्ज करा दी जाती हैं।ऐसे में कैसे सच्चाई से पर्दा उठेगा।पर्दा उठ भी गया तो वरीय पुलिस पदाधिकारी लेन देंन कर मामले को इतिश्री कर देते हैं।पूरे राज्य में एक दो जिलों को छोड़कर थाने से लेकर आईजी कार्यालय तक सिर्फ दलालों की भरमार हैं।इसका प्रतिकूल प्रभाव समाज पर भी पड़ता हैं और ऐसा नहीं हैं कि उस पुलिस पदाधिकारी पर नहीं पड़ता हैं ? इन दलालों के कारण ही पुलिस विभाग अपने कार्यशैली की सूचना खुद से अपराधियों तक पहुंचाने में मददगार हैं।अपराधियों पर लगाम लगाने के लिये बिहार सरकार को एक ठोस निर्णय लेने की जरूरत हैं।यही नहीं अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिये मजबूत आलाधिकारी को उस कुर्सी पर बैठाना होगा जहां से मजबूती से कार्य किया जा सके।हालांकि अब के महानिदेशक भी कोई कम नहीं हैं लेकिन ऐसा माना जा रहा हैं कि राजनीतिक कदमों के दबाव और उसकी आहट की वजह से वे ठोस निर्णय नहीं ले पा रहें हैं।यही कारण हैं कि चर्चा में यह आम हो गई हैं कि उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिये राज्य सरकार को पत्र लिख दिया हैं।बिहार में हत्याओं का दौर लगातार जारी हैं इसपर आखिर कौन लगाम लगाएगा।
कई वरीय पुलिस के पदाधिकारी भी दबे जुबान से कहते हैं कि गिरावट तो सभी विभागों में हुई हैं इसमें पुलिस विभाग भी हैं लेकिन पुलिस को और भी दुरुस्त होने की जरूरत हैं ताकि अपराधियों का पर काट दिया जाय तभी संभव हैं कि अपराधियों का मनोबल टूटेगा और मोहनपुर जैसी घटना दुबारा नहीं घटित होगी।