सदर एसडीपीओ का पर्यवेक्षण रिपोर्ट भी अर्जुन के बाण की तरह 

सिंहवाड़ा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में फर्जी विकलांगिता प्रमाण पत्र के मामले में अब पुलिस का रंग भी दिखने लगा हैं ,इस मामले में प्रमाण पत्र निर्गत करने वालों से लेकर आदेश निर्देश देने वाले सभी के ऊपर गाज गिरना तय हो गया हैं ,सिविल सर्जन भी दिव्यांगिता प्रमाण पत्र के मामले में आरोपी बन सकते हैं। सदर एसडीपीओ अमित कुमार का पर्यवेक्षण रिपोर्ट भी इसी और इशारा कर रहा हैं और सच्चाई भी यही हैं।एसडीपीओ का रिपोर्ट अर्जुन की बाण की तरह उस आंख को लपेटने के लिये तैयार हैं।ऐसा हो सकता हैं कि इस फर्जी दिव्यांगिता प्रमाण पत्र में जांचों उपरांत एक और प्राथमिकी हो सकती हैं या फिर दिये गये निर्देश के आलोक में अनुसंधानक सही दिशा में अनुसंधान करता हैं तो चिकित्सकों पर भी कारवाई तय हैं ?इस मामले में अपनी अपनी किये गये कारिस्तानी से बचने को  लेकर सिविल सर्जन के आदेश पर प्रभारी चिकित्सा प्रभारी ने अरुण कुमार चौधरी एवं उनकी पत्नी अनीता देवी पर फर्जी दिव्यांग का प्रमाण पत्र बनाने एवं इस प्रमाण पत्र के आधार पर आयकर में छूट लेने सहित अन्य सरकारी लाभ लेने एवं सरकारी राजस्व की क्षति को लेकर सिंहवाड़ा थाना में मामला 29/2023दर्ज कराया था।

कैसे निकला एक व्यक्ति के नाम पर चार दिव्यांगिता प्रमाण पत्र 

सदर अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी अमित कुमार ने अनुसंधानकर्ता को निर्देश दिया हैं कि सिविल सर्जन कार्यालय से एक ही व्यक्ति के नाम पर चार दिव्यांगिता प्रमाण के बारे में पूछताछ कर सत्यापित करें ?उन्होंने कहा कि जब सारे प्रमाण पत्र को सिविल सर्जन ने फर्जी मान लिया था तो फिर कैसे सिविल सर्जन द्वारा फिर से नया विकलांगिता प्रमाण पत्र बनाने का कैसे निर्देश दिया गया। आखिर किस परिस्थियों में उसी व्यक्ति का फिर से सर्टिफिकेट बन गया जिस कारण उसका लाभ उसने आयकर छूट में ले लिया। उन्होंने अनुसंधानक को कथित चारों फर्जी प्रमाण पत्र को जब्त करने का आदेश दिया हैं।

रबड़ी का प्रसाद था सो बांट दिया 

यहां बता दें कि रबड़ी के प्रसाद की तरह अरुण कुमार और उनकी पत्नी ने चिकित्सकों से यह प्रमाण पत्र मांगते रहा और चिकित्सको ने प्रसाद में विकलांगिता प्रमाण पत्र लगातार देते रहें। यह प्रमाण पत्र एक बार जिसे भी मिल गया फिर क्या हैं ,कई सरकारी लाभ आप उठा सकते हैं।नौकरी में लाभ उठा सकते हैं आयकर में भी छूट लें सकते हैं।

फर्जी प्रमाण पत्र बनाने में इतने डॉक्टर की भूमिका संदिग्ध 

इसका पूरा फायदा सिविल सर्जन और प्रभारी चिकित्सा प्रभारी के कृपा से एएनएम अनीता कुमारी और उनके पति अरुण कुमार ने उठाया हैं। मजेदार पहलू यह हैं कि सिविल सर्जन एक तरफ अरुण कुमार के दिव्यांगिता प्रमाण को रद्द करने का आदेश देते हैं वहीं दूसरी और सिविल सर्जन कुछ ही महीने बाद खुद 43%का प्रमाण पत्र निर्गत करते हैं जिस कारण एएनएम अनीता कुमारी 75हजार रुपये आयकर में छूट लें लेती हैं। इस मामले में जितना दोषी एएनएम हैं उतना ही दोषी पांच प्रभारी चिकित्सा प्रभारी और सिविल सर्जन हैं। इस मामले में पुलिस को बारीकी से अनुसंधान करने की जरूरत हैं। शुरुआत के दिनों में डॉ॰ वागीश झा ने 30%का विकलांगिता प्रमाण पत्र 27नवंबर 11को निर्गत किया था। इसके बाद डॉ गंगा नन्द झा ने क्रमश 40%और 60%यानि एक दिन में दो प्रमाण पत्र पांच जुलाई 13को निर्गत कर दिया। इसके बाद डॉ॰ मिथिलेश झा ने 50%का प्रमाण पत्र 15मार्च 16को निर्गत कर दिया। इस प्रमाण पत्र के सहारे बताया जाता हैं कि एएनएम के पुत्र ने भी सरकारी नौकरी में फायदा लिया हैं बल्कि इसी प्रमाण पत्र के कारण उसकी नौकरी हुई हैं ।इस बीच शिकायत मिलने पर फर्जी प्रमाण पत्र को लेकर जांच हुई जिसमें चारों प्रमाणपत्र फर्जी पाया गया।
इस बात के बाबत शोर गुल होने पर सिविल सर्जन ने डॉ॰ प्रेम चंद्र प्रकाश को 2/2/21में ही फर्जी विकलांगिता प्रमाण पत्र को लेकर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था लेकिन यह आदेश रद्दी के टोकरी में चला गया।इतना होने के बाद फिर से प्रभारी चिकित्सा प्रभारी डॉ॰ प्रेम चंद्र प्रकाश ने 50%का विकलांगिता प्रमाण पत्र दस मार्च 21को अरुण कुमार के नाम निर्गत कर दिया और ठीक एक महीना बाद यानि 16अप्रेल 21को सिविल सर्जन अनिल कुमार ने 43%का प्रमाण पत्र निर्गत कर फिर से उसे सभी लाभ लेने पर मजबूर कर दिया । अब सवाल यही से उठता हैं कि जिस सिविल सर्जन ने सभी प्रमाण पत्र को फर्जी मानते हुये उसे रद्द करते हुये प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश प्रभारी चिकित्सा प्रभारी को दिया फिर वहीं प्रभारी चिकित्सा प्रभारी और सिविल सर्जन ने फिर से प्रमाण पत्र अरुण कुमार को कैसे दे दिया ??इसी कारण ही दुबारा अरुण कुमार की पत्नी एएनएम अनीता कुमारी ने आयकर में छूट लें ली । अरुण कुमार का चार नहीं बल्कि इससे ज्यादा विकलांगिता प्रमाण पत्र निर्गत किया गया ?यह जांच का विषय हैं। इस मामले में काफी हाय तौबा मचने के दो साल बाद सिविल सर्जन के आदेश पर प्रभारी चिकित्सा प्रभारी द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराई गई हैं। जिसमें पति पत्नी आरोपी हैं। इस पूरे प्रकरण को देखा जाय तो एएनएम से लेकर सिविल सर्जन तक उतना ही दोषी हैं जितना कि अरुण कुमार और उसकी पत्नी हैं।