करनाल में गेहूं के कट्टों (बोरियों) की सिलाई में घोटाला का मामला सामने आया है.

 

करनाल: करनाल की अनाज मंडी में सरकारी गेहूं के कट्टों की सिलाई में बड़ा घोटाला सामने आया है. मंडी में आढ़तियों ने सरकार से प्रति कट्टा सिलाई के लिए 2 रुपए 12 पैसे लिए, लेकिन मजदूरों को और ठेकेदारों को महज एक रुपया प्रति कट्टा दिया गया. करनाल मंडी में अब तक करीब 26 लाख कट्टों की सिलाई हो चुकी है. ऐसे में लाखों रुपए का घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में बाकायदा मंडी प्रधान और आढ़तियों की आपसी “एडजस्टमेंट” की बात कही जा रही है.

26 लाख से ज्यादा कट्टों की सिलाई:सिलाई का ठेका करने वाले चंद्र कुमार यादव ने बताया, “ मैं और मेरा पार्टनर अहमद चौधरी करनाल, मुनक, निगदू और पिल्लुखेड़ा मंडी में सिलाई का काम कर रहे हैं. करनाल मंडी में अब तक 30 लाख कट्टों की आवक हुई है, जिनमें से 26 लाख से अधिक कट्टों की सिलाई हो चुकी है. इस काम के लिए उन्होंने लगभग 100 कर्मचारियों को लगाया और 120 सिलाई मशीनें लेकर आए. एक कट्टे की सिलाई का रेट एक रुपया दिया गया, जबकि सारा मटेरियल–धागा, मशीन और लेबर हमारी ओर से था. अभी तक हमें सिर्फ सात से आठ लाख रुपए ही मिले हैं, बाकी पैसे लेने के लिए हम चक्कर काट रहे हैं.”

मंडी की पंचायत में होती है बोली:चंद्र कुमार ने आगे बताया, “मंडी में जब ठेका मिलता है, तो आढ़तियों की पंचायत होती है, जिसमें 5-7 ठेकेदार हिस्सा लेते हैं. इनमें बोली लगती है और मंडी एसोसिएशन प्रधान सुरेंद्र त्यागी का इसमें मुख्य रोल होता है. वही तय करते हैं कि किसे ठेका देना है और कितना रेट देना है.”

गेहूं के कट्टों की सिलाई में घोटाला

बचा पैसा आढ़ती के पास ही जाता है:जब इस बारे में मंडी प्रधान सुरेंद्र त्यागी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि यह तो शुरू से ही होता आ रहा है. आढ़ती ही ठेकेदार तय करते हैं, सरकार से कोई ठेकेदार नहीं आता.

 

जब यह सवाल उठा कि 2.12 रुपए में से एक रुपया दिया गया तो बचा हुआ पैसा कहां गया? इस पर मंडी प्रधान ने जवाब दिया कि वह पैसा सरकार के पास नहीं जाता, बल्कि आढ़ती के पास ही आता है और वहीं उसे रखता है. कई बार सीजन के अनुसार एडजस्टमेंट हो जाती है. पिछली बार जीरी के सीजन में सिलाई में ज्यादा पैसे देने पड़े थे, जबकि सरकार की ओर से कम पैसे आए थे. इसी तरह लोडिंग में भी हमें 3.36 रुपए मिले थे और हमने 3.70 रुपए का रेट दिया, तो सिलाई के बचे पैसे वहां एडजस्ट हो गए.

कंपीटिशन के कारण रेट गिराए: इस मामले में ठेकेदार चन्द्र कुमार और हेमंत यादव ने बताया कि सिलाई के लिए कड़ी मेहनत करने के बावजूद हमें पूरा पैसा नहीं मिला. कंपीटिशन इतना है कि मजदूरों को काम देने के लिए हमें ही रेट कम करने पड़ते हैं. हम सोचते हैं कि मजदूर आदमी है, खाली बैठेगा तो क्या खाएगा, इसलिए जैसे-तैसे काम करवा रहे हैं, लेकिन इस व्यवस्था में असली नुकसान तो मजदूरों और ठेकेदारों का ही हो रहा है.