थानास्तर पर बनाए जा रहें शांति दूतों को लेकर चौक चौराहों पर हो रही हें चर्चा ,कुछ कानून विरोधी किस्म के लोग भी बन गये हें थाना के शांतिदूत ,जो खुद को संभाल नहीं सकते उन्हें दे दिया गया समाज को सुधारने की ठेकेदारी।अजब -गजब का खेल कर रहें हें थाना के थानेदार।
थानास्तर पर बनाए जा रहें शांति दूतों को लेकर चौक चौराहों पर हो रही हें चर्चा ,कुछ कानून विरोधी किस्म के लोग भी बन गये हें थाना के शांतिदूत ,जो खुद को संभाल नहीं सकते उन्हें दे दिया गया समाज को सुधारने की ठेकेदारी।अजब -गजब का खेल कर रहें हें थाना के थानेदार।
थानास्तर पर बनाए जा रहें शांति दूतों को लेकर चौक चौराहों पर हो रही हें चर्चा ,कुछ कानून विरोधी किस्म के लोग भी बन गये हें थाना के शांतिदूत ,जो खुद को संभाल नहीं सकते उन्हें दे दिया गया समाज को सुधारने की ठेकेदारी।अजब -गजब का खेल कर रहें हें थाना के थानेदार।
दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय
बिहार में पुलिसिया कार्यशैली स्वस्थ बनाने को लेकर डीजीपी का निर्देश भले जो हो ,लेकिन जमीनी हकीकत इससे पड़े हें।अक्सर कई थानों के थानेदार ईमानदारी का पाठ पढ़ाते दिख जाएंगे ,स्लोगन भी लिखा रहता हें लेकिन कार्यशैली ठीक विपरीत आपको दिखाई देगी।यू कहें तों चोरी भी और सीना जोड़ी भी।
हाल के दिनों में पुलिस महानिदेशक विनय कुमार ने थाना को पारदर्शी बनाने के लिये थाना में आगंतुक पंजी रखने का निर्देश दिया था ,सभी थानों में आगंतुक पंजी रजिस्टर भी आ गया ,अब थाना आने -जाने वालों का नाम -पता -मोबाईल नंबर भी लिखा जाने लगा ,निर्देश हें कि आगंतुक पंजीयों को सातवें -आठवें दिन सीसीटीवी फुटेज से भी मिलान किया जाना हें और इससे संबंधित प्रतिवेदन वरीय पुलिस अधिकारियों को सौंपना हें ताकि पारदर्शिता बने रहें।
लेकिन कई थानेदार तू डाल डाल मैं पात पात जैसे तरीकों को अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहें हें।दरभंगा जिला के कई थानों में शांति दूत बनाने की मुहिम चल रही हें और यह मुहिम पहले से चली आ रही हें।उदेश्य यही हें कि यह शांति दूत थाना क्षेत्र में हुये बवाल में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभा सके।
शांति दूत का पट्टा थानेदार को उसके गले में बांधना चाहिये ,जो दिन रात सामाजिक कार्यों में लगा हो।मुहल्ले /वार्डों में रसूख हो जिसकी समाज में प्रतिष्ठा हो।कुछ पुराने ऐसे शांति दूत हें भी जो समाज में हमेशा नेक संदेश देते रहते हें और काम भी करते हें और समाज में इनकी पकड़ भी जबरदस्त हें।
लेकिन इन दिनों देखा जा रहा हें कि जिनकी पकड़ समाज में नहीं हें ,प्रतिष्ठा भी नहीं हें ,चाल -चलन भी गड़बड़ हें ,पूर्व में आपराधिक मुकदमे भी हें और इन मुकदमों में चार्ज शीटेड भी हें ऐसे लोंगों को थाना का शांति दूत बना दिया गया हें।
चर्चा हें कि इन मुकदमों के चलते पुलिस से जान पहचान हुई जिसका फायदा इन्हें दलाली करने में हुई ,मतलब थाना /पुलिस के दलाल हें।
डीजीपी के आगंतुक पंजी के निर्देश के बाद थाना जाने आने में इन दलालों की परेशानी बढ़ी हें।फिर थानेदारों ने अपने शातिर दिमाग का इस्तेमाल शुरू किया और ऐसे कुछ सदस्यों को थाने का शांति दूत बना दिया ,ताकि ताल ठोंककर थाना में आ सके और अपने मंसूबे को कामयाब कर सके।इस बात की चर्चा हर चौक -चौराहों पर होने लगी। कई पुराने शांति दूत भी कह रहें हें कि कुछ दलाल लोंगों की इंट्री शांति दूतों में हो गई जो समाज और थाना पुलिस के लिये भी हानिकारक हें।ऐसे में पुलिस की छवि और धूमिल होगी।
पुराने कुछ शांति दूत तों सामाजिक कार्यों में हमेशा से मशगूल रहें हें और ऐसे लोंगों को शांति दूत बनाया जाना भी सही हें लेकिन इसमें कुछ शांति दूत ऐसे बनाए गये हें जो थाने को अपने अनुसार चलाने की कोशिश करते रहे हें और इसके एवज में थानेदार को वे मोटा रकम देते हें इनके इशारे पर ही थाने में प्राथमिकी दर्ज होती हें ,अभियुक्त पकड़े या छोड़े जाते हें ,केस के अनुसंधान में पैसो का बड़ा खेल होता हें,और वरीय पुलिस अधिकारियों तक यह बात नहीं पहुंच पाती हें जिससे इनका मनोबल बढ़ा रहता हें।अब शांति दूत बनने के बाद सीना ठोंककर थाने की दलाली भी करेंगे ,और सामने से थाने भी आयेंगे।इसलिये कहते हें चोरी भी और सीना जोड़ी भी।
थानेदार को चाहिये कि मुहल्ले /टोलों के आठ -दस लोंगों से बात कर समाज के प्रतिष्ठित युवकों /युवतियों को शांति दूत बनाए ताकि समाज का भला हो सके,दलाल नहीं ?और जो दलाल लोंगों को शांति दूत का पट्टा थाने से लगा दिया गया हें ,पुलिस को अब भी मौका हें कि उसके गले से पट्टा छीन ले क्यूंकि इससे पूरा पुलिस महकमा बदनाम होता हें और पुलिस की छवि खराब होती हें।