कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड में स्थित मां मुंडेश्वरी धाम में नवरात्रि का पहला दिन भक्तों की भारी भीड़ के साथ शुरू हुआ। पवरा पहाड़ी पर 600 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर विश्व के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माना जाता है।

सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए 15 चेकप्वाइंट बनाए गए हैं। मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और श्रद्धालुओं की सहायता के लिए हेल्पलाइन सेंटर की भी स्थापना की गई है। पुलिस बल और मजिस्ट्रेट के साथ मंदिर प्रशासन की टीम भी तैनात है।

मंदिर की विशेषता इसकी अनोखी बलि प्रथा है। यहां बकरे को काटा नहीं जाता, बल्कि अक्षत और फूल से बलि दी जाती है। श्री यंत्र आकार का यह अष्टकोणीय मंदिर मां वाराही को समर्पित है। मंदिर के मुख्य भाग में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है, जिसका रंग सूर्य की स्थिति के साथ बदलता है।

526 ईसा पूर्व मंदिर की हुई स्थापना

मां मुंडेश्वरी धार्मिक न्यास परिषद के सचिव अशोक सिंह ने बताया कि यह मंदिर 526 ईसा पूर्व से विराजमान है। मां द्वारा मुंड राक्षस का वध करने के कारण इसे मुंडेश्वरी नाम मिला। नवरात्रि के दौरान सप्तमी, अष्टमी और नवमी को मंदिर की भव्य सजावट की जाती है। इसके लिए पिछले 10 वर्षों से थाईलैंड और बैंकॉक से विशेष फूल मंगवाए जाते हैं।

हर मनोकामना होती पूरी

मंदिर के पुजारी राधे श्याम झा ने बताया कि यहां मन्नत मांगने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होने पर बकरा चढ़ाया जाता है। बकरे को अक्षत से बलि देने के बाद वह पुनः जीवित हो जाता है। इस अनूठी परंपरा को देखने देश-विदेश से श्रद्धालु यहां आते हैं।