बिहार दिवस के शुभ अवसर पर सासाराम के फजलगंज मल्टीपरपज हॉल में कला के एक अनूठे रूप का प्रदर्शन किया गया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस विशेष आयोजन में मल्टी लेयर मंडला आर्ट की अद्भुत पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया गया, जो बिहार की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और परंपरा को नए अंदाज में दर्शाती हैं।
मंडला आर्ट: परंपरा और आधुनिकता का संगम मंडला आर्ट, जो पारंपरिक रूप से ज्यामितीय पैटर्न और सांस्कृतिक प्रतीकों से भरपूर होता है, इस बार मल्टी लेयर तकनीक के माध्यम से एक नई ऊंचाई दी गई। इस तकनीक के तहत, विभिन्न परतों को एक साथ जोड़कर कला को गहराई और त्रि-आयामी (3D) स्वरूप प्रदान किया गया, जिससे चित्रों में जीवंतता आ गई।
कलाकारों ने अपनी अद्वितीय शैली में बिहार की समृद्ध धरोहर, ऐतिहासिक स्थलों, लोककथाओं और पारंपरिक कलाओं को इन चित्रों में उकेरा। ” बिहार की संस्कृति और विरासत का अद्भुत चित्रण ” इस प्रदर्शनी में विशेष रूप से महाबोधि मंदिर, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय, सोनपुर मेला, मधुबनी पेंटिंग और छऊ नृत्य जैसी बिहार की प्रसिद्ध सांस्कृतिक धरोहरों को मंडला आर्ट के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
कलाकारों ने रंगों और पैटर्न्स के अनोखे मिश्रण से इन चित्रों में नई जान डाल दी, जिससे हर पेंटिंग एक अलग कहानी बयां करती नजर आई। इस अनोखी प्रदर्शनी को देखने के लिए सैकड़ों कला प्रेमी, स्थानीय नागरिक और गणमान्य व्यक्ति पहुंचे। दर्शकों ने इस कला की सराहना करते हुए कहा कि “यह न केवल एक कला प्रदर्शन था, बल्कि बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा का जीवंत चित्रण भी था।”
“हमारा उद्देश्य बिहार की समृद्ध संस्कृति और परंपरा को एक नए रूप में प्रस्तुत करना था, ताकि युवा पीढ़ी भी अपनी विरासत को पहचान सके।”
कलाकारों को सम्मानित किया गया
उन्होंने बताया कि मंडला आर्ट केवल एक चित्रकला नहीं, बल्कि ध्यान और आध्यात्मिकता से जुड़ी एक विधा है, जिसे आधुनिक तकनीकों के साथ प्रस्तुत कर इसे और आकर्षक बनाया जा सकता है। बिहार सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा आयोजित इस कला प्रदर्शनी ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कला का संगम बेहद प्रभावशाली हो सकता है।
इस प्रकार के आयोजन बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों को भी प्रोत्साहित करते हैं। बिहार दिवस के अवसर पर मल्टी लेयर मंडला आर्ट का यह अनोखा प्रदर्शन न केवल बिहार की गौरवशाली परंपरा को दर्शाने में सफल रहा, बल्कि दर्शकों के लिए भी एक यादगार अनुभव बन गया। ऐसे आयोजन न केवल कला के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई पहचान देते हैं।
