संस्कृत संजीवनी है : कुलपति प्रो0 पांडेय
कहा- विश्व स्तर पर जमानी है इसकी धाक
संस्कृत के प्रचार व प्रसार पर दिया बल
करीब घण्टा भर चली प्रधानाचार्यों संग बैठक
अपने विजन को स्पष्ट करते हुए कार्य संस्कृति में दिए सुधार के सुझाव
दरभंगा/संजय कुमार राय
संस्कृत संजीवनी है। समय साक्षी है । विदेशी ताकतों ने इसे खत्म करने का अथक प्रयास किया लेकिन सारी ताकतें बेकार रही।कोई इसे चाहकर भी नही मार सकता। यह अजर-अमर है। इसके प्रचार व प्रसार की महती जिम्मेदारी हमलोगों जैसे संस्कृतानुरागियों
पर ही है। ज्ञान, विज्ञान,दर्शन व संस्कृत के मामले में मिथिला का बहुत सशक्त इतिहास रहा है। यही कारण रहा कि महाराजाधिराज डॉ0 सर कामेश्वर सिंह ने संस्कृत के सम्वर्धन व विकास के लिए अपना राज पैलेस तक दान कर दिया। हम उन विभूति के प्रति भी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, नमन करते हैं। उक्त बातें पूरे प्रदेश से ऑनलाइन बैठक में जुड़े संस्कृत महाविद्यालयों के प्रधानाचार्यों को सम्बोधित करते हुए कुलपति प्रो0 लक्ष्मी निवास पांडेय ने शनिवार को कही। बैठक में कुल 78 प्रधानाचार्य जुड़े थे।
उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने बताया कि वैसे तो बैठक में कई विन्दुओं पर चर्चा की गयी लेकिन संस्कृत बोलचाल की भाषा कैसे बने, कैसे इस भाषा को समाज में सुग्राह्य बनाई जाय, कौन कौन वैसे प्रयास किया जाय ताकि छात्र अधिक संख्या में संस्कृत से जुड़े इस पर कुलपति प्रो0 पांडेय का मुख्य फोकस रहा। कुलपति ने मन से, वचन से व व्यवहार से शुद्ध, स्पष्ट व स्वच्छ रहने पर भी बल दिया। साथ ही, कार्यालयीय कार्यों व शिक्षण व्यवस्था में भी उन्होंने समेकित सुधार की दरकार जताई।
कुलपति ने सवालिए लहजे में कहा कि संस्कृत को देवभाषा कहकर हमसभी कहीं न कहीं अशुद्ध बोलने के भय से या फिर संकोच से इस भाषा का उपयोग ही कम करने लगे हैं। इसीसे यह भाषा कठिन होने लगी है। जबकि सच्चाई यह है कि जब हम बोलेंगे तभी समाज सुनेगा, तभी छात्र हमारी ओर आकर्षित होंगे और देववाणी लोकवाणी बन जाएगी। यह सम्भव है, प्रयास करके तो देखें। बोलने से सब होगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो मूक होते हैं वे स्वाभाविक रूप से बधिर भी होते हैं। यही कारण है कि जब हम संस्कृत बोलते ही नहीं हैं तो हमें यह सुनाई भी नहीं देती है। संस्कृत के प्रचार व प्रसार के लिए उन्होंने सम्भाषण पर बहुत जोर दिया। कहा कि बेहतर होगा खेल -खेल में, नृत्य में, नाटक में संस्कृत का प्रयोग करें। इसके लिए शिविर लगाएं, विशेष कक्षाएं संचालित करें तथा कार्यशाला का आयोजन करें। देखेंगे कुछ ही दिनों में वातावरण बदल जायेगा।
कुलपति ने यहां तक कहा कि कुछ देर ही सही, व्यवहार में इसे रोज लाएं।देखिए निखार आ जायेगा।शिक्षक भी जब समाज मे जाएं तो कुछ समय संस्कृत में अवश्य बोलें। इससे लोगों का इस भाषा के प्रति न सिर्फ विश्वास बढ़ेगा बल्कि संस्कृत भी पल्लवित व पुष्पित होगी। उन्होंने अगली बैठक में संस्कृत में ही बातचीत करने की सभी से अपेक्षा की।
इसी क्रम में कुलपति ने भौतिक व आंतरिक दोनों स्वच्छता को खास अहमियत देने पर भी जोर दिया। विश्वविद्यालय में जाने अनजाने हुए दुराभ्यास को जड़ से खत्म करने का संकल्प दिलाते हुए उन्होंने कार्य संस्कृति में सुधार की पुरजोर वकालत की। काम मे बाहरी व्यक्तियों के हस्तक्षेप को सिरे से खारिज करने की भी उन्होंने सलाह दी। उन्होंने एक तरकीब सुझायी कि अगर ऐसा व्यक्ति आपके कार्य मे दखलंदाजी दे तो उनसे यही कहें कि हमलोग संस्कृत को सर्वजन बनाने में लगे हुए हैं।आप भी हो सके तो सहयोग करें।
कुलपति प्रो0 पांडेय ने नई शिक्षा नीति के तहत भारतीय ज्ञान व्यवस्था को व्यापक रूप देने की रूप रेखा खिची। कहा कि अब अपने विश्वविद्यालय को भी आधुनिक बहुविषयक बनाना है। इसके लिए जरूरी सार्थक प्रयास किए जाएंगे। आधुनिक विषयों को प्राच्य विषयों के साथ किस रूप में शामिल किया जाए तथा छात्र हित में पाठ्यक्रम का स्वरूप कैसा हो, इस पर जल्द ही काम शुरू होगा।
सूचना वैज्ञानिक डॉ नरोत्तम मिश्र द्वारा उपलब्ध तकनीकी व्यवस्था में जुड़े कई प्रधानाचार्यों ने अपनी समस्यायें भी गिनायी। पूर्व कुलपति व महन्थ शतानन्द गिरी हरिहर संस्कृत कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ अरविंद कुमार पांडेय ने विश्वविद्यालय मुख्यालय में सभी प्रधानाचार्यों की एक तय अवधि के अंतराल में कार्यशाला आयोजित करने का प्रस्ताव दिया जिसे कुलपति ने सराहा। वहीं सभी प्रधानाचार्यों से कहा गया कि अगले तीन चार दिनों में वे अपने कालेजो की विधिसम्मत समस्याओं से विश्वविद्यालय को अवश्य अवगत करा दें। ताकि समाधान निकाला जा सके।

