बिहार में जमीन खरीदना हुआ महंगा, मापी शुल्क दोगुना; सर्किल रेट और स्टाम्प ड्यूटी भी बढ़ी
बिहार में जमीन खरीदना हुआ महंगा, मापी शुल्क दोगुना; सर्किल रेट और स्टाम्प ड्यूटी भी बढ़ी
बिहार में जमीन खरीदना हुआ महंगा, मापी शुल्क दोगुना; सर्किल रेट और स्टाम्प ड्यूटी भी बढ़ी
दस्तक 7मीडिया /पटना
बिहार सरकार ने राज्य में जमीन की खरीद-बिक्री और उससे जुड़े प्रशासनिक कार्यों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में जमीन की मापी (नापी), रजिस्ट्री और सरकारी न्यूनतम मूल्य (एमवीआर/सर्किल रेट) से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव को मंजूरी दी गई है। नए प्रावधान लागू होने के बाद राज्यभर में जमीन खरीदना, उसकी रजिस्ट्री कराना और मापी कराना पहले की तुलना में काफी महंगा हो जाएगा।
सरकार ने रैयती जमीन की मापी शुल्क में सीधी 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अब प्रति खेसरा मापी शुल्क 500 रुपये की जगह 1,000 रुपये देना होगा। चार या उससे अधिक खेसरा होने पर अधिकतम शुल्क 4,000 रुपये निर्धारित किया गया है। वहीं नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत क्षेत्रों में प्रति खेसरा मापी शुल्क 1,000 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दिया गया है, जहां अधिकतम शुल्क 8,000 रुपये तय किया गया है।
जमीन की रजिस्ट्री को भी महंगा बनाते हुए सरकार ने न्यूनतम मूल्य रजिस्टर (एमवीआर) में संशोधन लागू कर दिया है। शहरी और उससे सटे क्षेत्रों में सर्किल रेट को लगभग दोगुना कर दिया गया है, जबकि ग्रामीण इलाकों में सरकारी जमीन के मूल्य में करीब 60 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है। इसके साथ ही सामान्य श्रेणी के खरीदारों के लिए स्टाम्प ड्यूटी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दी गई है। हालांकि महिला खरीदारों को स्टाम्प ड्यूटी और निबंधन शुल्क में मिलने वाली पूर्व की छूट यथावत रखी गई है।
सरकार ने भविष्य के लिए भी नया प्रावधान किया है। अब प्रत्येक वित्तीय वर्ष की शुरुआत में एमवीआर में स्वतः 5 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जबकि हर तीन वर्ष पर भूमि के सरकारी मूल्य का व्यापक पुनरीक्षण किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे सरकारी मूल्य बाजार दरों के अधिक करीब रहेंगे।
फर्जीवाड़े और विवादित जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगाने के उद्देश्य से दाखिल-खारिज और रजिस्ट्री की प्रक्रिया को भी सख्त बनाया गया है। अब अंचल अधिकारी (सीओ) की जांच रिपोर्ट के बिना जमीन की रजिस्ट्री नहीं हो सकेगी। वहीं दाखिल-खारिज के प्रत्येक आवेदन का मिलान सरकार द्वारा जारी प्रतिबंधित सरकारी भूमि की सूची से किया जाएगा।
सरकार का मानना है कि इन बदलावों से भूमि प्रबंधन व्यवस्था अधिक पारदर्शी होगी और सरकारी राजस्व में वृद्धि होगी। हालांकि नए नियमों के लागू होने से आम लोगों पर जमीन खरीदने और उससे संबंधित प्रक्रियाओं का आर्थिक बोझ पहले की तुलना में काफी बढ़ जाएगा।