अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस पर बिहार के संविदा कर्मियों की पीड़ा और संघर्ष

दस्तक 7 मीडिया /दरभंगा 

पूरी दुनिया आज अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस मना रही है। इस अवसर पर मजदूरों के अधिकार, सम्मान और सुरक्षा की बातें बड़े मंचों से की जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग नजर आती है। प्रत्येक वर्ष 1 मई को यह दिवस मनाया जाता हे

बिहार में ग्राम पंचायत, प्रखंड और समाहरणालय स्तर पर विकास कार्यों की रीढ़ माने जाने वाले संविदा कर्मी आज भी उपेक्षा का शिकार हैं। ये कर्मी दिन-रात मेहनत कर सरकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाते हैं, फिर भी इन्हें न तो स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिलता है और न ही पर्याप्त मानदेय।

जिला ग्रामीण आवास सेवा संघ के जिला अध्यक्ष राहुल पासवान के अनुसार, पंचायत स्तर पर कार्यपालक सहायक, पंचायत रोजगार सेवक, ग्रामीण आवास सहायक, विकास मित्र, कचहरी सचिव, टोला सेवक और किसान सलाहकार जैसे हजारों संविदा कर्मी निरंतर कार्यरत हैं। इनकी भूमिका पंचायत के समग्र विकास में बेहद महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बताया कि आम धारणा के विपरीत, जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन में संविदा कर्मियों की भूमिका सबसे अधिक होती है। बावजूद इसके, इन्हें अक्सर एक मजदूर से भी कम मानदेय पर काम करना पड़ता है।

संविदा कर्मियों की समस्याएं तब और स्पष्ट होती हैं, जब त्योहारों के समय भी उन्हें समय पर मानदेय नहीं मिल पाता। कई कर्मी अपने बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ रहते हैं। हाल ही में एक पर्व के दौरान भी कई कर्मी वेतन के इंतजार में रहे और त्योहार के बाद भुगतान मिलने से उनकी उम्मीदें टूट गईं।

गौरतलब है कि बिहार सरकार ने संविदा कर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए अशोक चौधरी समिति का गठन किया था। समिति ने वर्षों पहले अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे कर्मियों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।

ऐसे में संविदा कर्मियों का मानना है कि सरकार को जल्द ठोस कदम उठाते हुए उनकी सेवा शर्तों में सुधार करना चाहिए, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।

अंत में राहुल पासवान ने अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस के अवसर पर सभी संविदा कर्मियों और श्रमिकों को शुभकामनाएं देते हुए अपने अधिकारों के लिए एकजुट रहने का आह्वान किया।