सीवान में JDU ने बुधवार की रात एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, इस दौरान सांसद विजयलक्ष्मी कुशवाहा खूब चर्चे में रही। दरअसल, मंच पर सांसद विजयलक्ष्मी कुशवाहा और उनके पति, पूर्व विधायक रमेश कुशवाहा भी मौजूद थे।
जैसे ही प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हुआ, पत्रकारों ने सवाल पूछना शुरू किया वैसे ही पति ने सांसद के हाथ से माइक छिन लिया। सारे सवालों का जवाब वो खुद ही देने लगे। इस हरकत से राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गया है। इसे न केवल महिला सम्मान बल्कि संसदीय परंपरा का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।
जिला अध्यक्ष ने खुद सांसद को किया दरकिनार
प्रेसवार्ता की पूरी व्यवस्था जदयू के जिला अध्यक्ष चन्द्रकेतु सिंह द्वारा की गई थी। मंच पर सांसद विजयलक्ष्मी कुशवाहा मौजूद थीं, लेकिन बोलने का अवसर उन्हें नहीं दिया गया।
इसके उलट, उनके पति रमेश कुशवाहा को माइक सौंप दिया गया, जिन्होंने न सिर्फ कार्यक्रम की बागडोर संभाली, बल्कि पत्रकारों के हर सवाल का जवाब भी खुद दिया। सांसद पूरी प्रेसवार्ता के दौरान मूकदर्शक बनी रहीं।
विपक्ष पर हमलावर हुए पति, पत्नी की पढ़ाई पर किया बचाव
रमेश कुशवाहा ने प्रेसवार्ता में सिवान में बनने वाले तीन रेलवे पुलों का श्रेय खुद और अपनी पार्टी को देते हुए विपक्षी विधायकों पर जमकर हमला बोला। सदर विधायक अवध बिहारी चौधरी की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, “छह बार विधायक रहने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र में कोई काम नहीं कराया।” जीरादेई के माले विधायक अमरजीत कुशवाहा पर उन्होंने घूसखोरी जैसे गंभीर आरोप तक लगा दिए।
इतना ही नहीं, रमेश कुशवाहा ने अपनी ही पत्नी सांसद की पढ़ाई-लिखाई पर सवाल उठाने वालों का बचाव करते हुए कहा, ‘पढ़ी-लिखी नहीं हैं तो क्या हुआ, विकास तो कर रही हैं।’ उन्होंने सांसद की तुलना तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री कामराज से कर दी।
राजनीतिक विश्लेषकों ने उठाए गंभीर सवाल
राजनीतिक विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को लोकतंत्र और महिला सशक्तिकरण के लिए चिंताजनक बता रहे हैं। उनका कहना है कि जब मुख्यमंत्री और जदयू नेतृत्व महिलाओं को 50% आरक्षण, सत्ता में भागीदारी और सम्मान की बातें करते हैं, तो उसी पार्टी की एक निर्वाचित महिला सांसद को बोलने तक न देना पार्टी के मूल्यों की पोल खोलता है।
क्या सांसद सिर्फ नाम की प्रतिनिधि बनकर रह गईं?
इस घटना के बाद सिवान की सियासत में एक नया सवाल खड़ा हो गया है, ‘क्या सांसद सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए हैं, और असल सियासत उनके पतियों के हाथों में है?’ जनता यह भी पूछ रही है कि जब एक महिला सांसद को मंच से किनारा किया जा सकता है, तो आम महिलाओं के हक की लड़ाई कौन लड़ेगा?
