दरभंगा सहित बिहार के कई जिलों में जमीन कारोबार से जुड़े लोंगों की हत्याएं हो रही हैं ,इसके कारण लोंगों के बीच डर का माहोल हैं। यह हत्याएं क्यू हो रही हैं ,ऐसा लग रहा हैं कि इसके रोकथाम में पुलिस और जिला प्रशासन दोनों विफल हैं। हत्या हो होती हैं ,हाय तौबा मचती हैं ,फिर नेतागिरी होती हैं ,पुलिस एफआईआर दर्ज करती हैं ,अपराधियों को पकड़ने में पुलिस जी जान लगा देती हैं ,अपराधी पकड़े भी जाते हैं ,उसे सजा भी होती हैं लेकिन इससे मृतक के परिवार के लोंगों को क्या फायदा हैं ?यह हत्याएं क्यू हो रही हैं ,किस कारण से हो रही हैं ,इस बात को समझने के लिये कोई भी आलाधिकारी तैयार नहीं हैं ?हत्याओं के इस दौर को रोकने में आखिर जिला प्रशासन या जिला पुलिस का रोल हैं अथवा नहीं ?
लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्य हैं कि जिला प्रशासन अथवा जिला पुलिस  के अनदेखी के कारण ही घटना घटती हैं। सरकार कहती हैं जिला प्रशासन एवं जिला पुलिस के अधिकारी समय देकर जमीनी विवाद को खत्म करें। थाना स्तर पर भी सप्ताह में एक बार सीओ और थानाध्यक्ष के साथ बैठक होती हैं लेकिन समुचित समाधान नहीं निकलता।इस कारण असंतोष बढ़ता हैं। पर कभी भी जिला में बैठे अधिकारी इस बात पर गौर नहीं करते कि साप्ताहिक बैठक में आखिरकार कितने जमीनों का निपटारा हुआ हैं अगर निपटारा नहीं हुआ हैं तो क्यू ?
सच्चाई तो यही हैं कि जमीनी विवाद में थानाध्यक्ष और सीओ की भूमिका संदिग्ध हैं। खासकर शहरी इलाकों में बढ़े हुये जमीनों की कीमतें और विवादास्पद जमीन के बीच सीओ और थानेदार की भूमिका स्वच्छ नहीं हैं। खासकर सीओ की भूमिका तो बढ़ चढ़कर हैं। इनकी गलती के कारण ही जमीन का विवाद होता हैं और इन विवादास्पद जमीन को भू माफिया कहें या अपग्रेड भाषा में रियल स्टेट के मालिक कम दामों में जमीन खरीदकर और उसपर कब्जा जमाने के लिये थानेदार को चुप रहने के लिये पैसा देते हैं ,जमीन पर कब्जा कराने के लिये पैसा देते हैं और सीओ को बड़ी मोटी रकम देकर अपने पक्ष में कागजात बनाने के लिये पैसा देते हैं। इसी में दूसरा पक्ष मजबूत हैं तो लड़ाई झगड़ा। इन दोनों पक्षों में जो मजबूत हैं वो गोलियां तक चला देते हैं और शुरू हो जाता हैं खूनी खेल ?इस खेल के और भी कारण हो सकते हैं लेकिन जमीन कारोबार से जुड़े लोग वर्चस्व की लड़ाई लड़ लेते हैं। तड़ातड़ गोलियां चलती हैं और लोग मारे जाते हैं ,जमीन धरी रह जाती हैं। पैसों के इस खेल में सभी के दाग लंबे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो सिन्हा होमियोपेथिक कॉलेज की जमीन पर पूरा सैदनगर बस गया और जिला प्रशासन मूकदर्शक बनी रही। यह जमीन राज्यपाल द्वारा अधिग्रहित जमीन थी। ऐसा लगता हैं कि सरकार भी भूल चुकी हैं ॥शहर के सभी सरकारी पोखरे भर कर बेच दिये गये।यह सोचने वाली बात हैं कि इन जमीनों का दाखिल खारिज कैसे हुआ। कोई ना कोई सीओ ही इसका दाखिल खारिज किया होगा और सीओ के रिपोर्ट के आधार पर ही डीसीएलआर द्वारा मुहर लगाया गया होगा ?
दरभंगा राज के सेंकड़ों बीघे जमीन पर लोग दखल कब्जा कर बस गये और दाखिल खारिज तक हो गया। दबंग लोग इस जमीन को हथियाने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ा और इसका परिणाम अगलगी कांड हुआ जिसमें एक बच्चे सहित दो परिजन की मौत हुई। रवि सिंह ,अनिल सिंह आदि हत्या के अलावे पूर्व में भी कई विवादित जमीनों को लेकर खूनी खेल खेला गया ?वास्तव में देखा जाय तो इन घटनाओं के गुनेह्गार कौन हैं ?ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में विवादित जमीन लेकर लोग अपना जान गंवा देता हैं और जमीन धरी की धरी रह जाती हैं। मुजफ्फरपुर जिला में आशुतोष शाही समेत दो बॉडीगार्ड की हत्या भी इसी का परिणाम हैं। कई अन्य जिलों से भी ऐसी वारदातों की खबर आती हैं। लेकिन एक अहम सवाल हैं कि इस खूनी खेल को करवाने में और किसका किसका हाथ हो सकता हैं।ऐसे मामले को भी रोकने कि जवाबदेही सरकार की होनी चाहिये इसके लिये सरकार को जांच कराने की आवश्यकता हैं ?सिर्फ भूमाफिया या कोई अपराधी इसके जिम्मेदार बाद में हैं इससे पूर्व यह जांच होनी चाहिये कि वास्तव में जमीन किसकी हैं ? रजिस्टर 2में नाम दर्ज के अनुसार वंशजों के बीच जमीनों का बंटवारा जायज हैं अगर यह बंटवारा नहीं हुआ हैं तो गलत या फर्जी दस्तावेजो का अवलोकन अधिकारी करें , लेकिन आप गौर से अंचल के रजिस्टर का अवलोकन करेंगे तो उसमें छेड़छाड़ किया हुआ मिलेगा।इसे पारदर्शी बनाने की जरूरत हैं ताकि जमीन के मामले में खूनी खेल का सिलसिला खत्म हो ?